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देश सचमुच अंगड़ाई ले रहा है—और इस बार बेचैन है युवा
“भारतीय राजनीति के पुराने नारों के बीच उभर रही एक नई नागरिक चेतना, जिसे केवल वोट-बैंक समझना आने वाले भारत…
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“जब संसद, अदालत, छात्र-आंदोलन और नागरिक अधिकार एक ही दिन में सामने हों, तब मीडिया का असली इम्तिहान शीर्षक नहीं, विवेक होता है”
मीडिया की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि वह क्या छापता है, बल्कि यह है कि वह क्या पहले और…
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पत्रकार सुरक्षा कानून, फर्जी मुकदमों पर रोक और मानदेय सुनिश्चित करने की मांग तेज
नई दिल्ली। देशभर में पत्रकारों की सुरक्षा, स्वतंत्र कार्य-परिस्थितियों और सम्मानजनक पेशेवर अधिकारों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर आवाज़ तेज…
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सुरक्षा का असली अर्थ: जब विरोध का मंच महिलाओं के लिए भय नहीं, भरोसा बन जाए
भारत में स्त्रियों की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक बहस अक्सर दो झूठे ध्रुवों के बीच फँस जाती है। एक ध्रुव…
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प्रधानमंत्री की ‘माफी-राजनीति’ और पीढ़ी का प्रतिरोध: जब सत्ता युवाओं को उपदेश नहीं, जवाब दे?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति का एक स्थायी चरित्र रहा है—वह स्वयं को “प्रधानसेवक” कहें या “जनसेवक”, सत्ता के शीर्ष…
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इथेनॉल नीति: ऊर्जा सुरक्षा या उपभोक्ता पर छिपा हुआ कर?
भारत की इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) नीति अब केवल ऊर्जा, पर्यावरण या किसानों की आय का विषय नहीं रह गई…
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पेटेंट, विज्ञान और राजनीति: गाय के मूत्र पर बहस में तथ्य कहाँ है?
लोकतंत्र में विचारों की विविधता सम्माननीय है, लेकिन विज्ञान का पहला नियम है—दावा तभी मान्य है जब वह प्रमाण से…
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साथियों, आज मैं देश के चौथे स्तंभ, मीडिया से एक सवाल पूछना चाहता हूँ- बदन सिंह कुशवाह
जब किसी मंदिर में कोई चमत्कार होने की बात आती है, जब किसी सनसनीखेज घटना को दिखाना होता है, तब…
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श्रावण मास : शिवभक्ति, कांवड़ यात्रा और भारतीय अध्यात्म का वर्षा-गीत
भारतीय पंचांग में कुछ ऐसे मास हैं जिनका उल्लेख केवल कालगणना के रूप में नहीं, बल्कि ‘जीवन-दृष्टि’ के रूप में…
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पत्रकारों पर नज़र, लेकिन सवालों पर नहीं: क्या पारदर्शिता अब भी चयनात्मक है?
लखनऊ से आई यह खबर केवल एक विभागीय पत्र की कहानी नहीं है। यह उस बड़े विमर्श की शुरुआत है,…
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