
“भारतीय राजनीति के पुराने नारों के बीच उभर रही एक नई नागरिक चेतना, जिसे केवल वोट-बैंक समझना आने वाले भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल हो सकती है”
संभव है कि भारत इस समय केवल एक राजनीतिक दौर से नहीं गुजर रहा, बल्कि किसी गहरे सामाजिक और लोकतांत्रिक परिवर्तन की पूर्वपीठिका लिख रहा है।
इस परिवर्तन की सबसे स्पष्ट आहट संसद के भीतर नहीं, सड़कों पर सुनाई दे रही है। चुनावी रैलियों में नहीं, विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के बीच दिखाई दे रही है। टेलीविजन के स्टूडियो में नहीं, जंतर-मंतर, प्रयागराज, कोटा, देहरादून और अब रांची जैसे शहरों में सुनाई दे रही है। और इस आहट का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—”युवा।”
लेकिन यह केवल इतना भर नहीं है कि युवा नाराज़ हैं। भारत में युवा पहले भी नाराज़ हुए हैं, आंदोलित हुए हैं और सरकारों को चुनौती देते रहे हैं। नया तत्व यह है कि आज का युवा अपने जीवन की समस्याओं को व्यापक राजनीतिक और संस्थागत प्रश्नों से जोड़कर देख रहा है। वह पूछ रहा है—
* मेरी परीक्षा निष्पक्ष क्यों नहीं?
* नौकरी समय पर क्यों नहीं?
* भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक क्यों लटकती है?
* विश्वविद्यालय महँगे होते जा रहे हैं तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कहाँ है?
* यदि संविधान मुझे समान अवसर देता है तो अवसरों तक पहुँच इतनी असमान क्यों है?
* और सबसे कठिन सवाल— “जिस व्यवस्था से मेरे भविष्य का फैसला होना है, उस व्यवस्था पर मैं भरोसा क्यों करूँ?”
यही वह प्रश्न है जिसने भारतीय राजनीति के पुराने व्याकरण को असहज करना शुरू कर दिया है।
*यह केवल Gen Z की कहानी नहीं है*
भारत में Gen Z की अनुमानित आबादी लगभग 37.7 करोड़ बताई जाती है और वह देश की कुल आबादी का लगभग 27 प्रतिशत है। लेकिन इस संख्या को महज चुनावी गणित की तरह देखना गंभीर भूल होगी। क्योंकि नई पीढ़ी का राजनीतिक व्यवहार केवल उसकी उम्र से नहीं, उसके सूचना-संसार से बन रहा है।
यह वह पीढ़ी है जो एक ही दिन में दिल्ली की घटना देख सकती है, झारखंड के प्रदर्शन का वीडियो देख सकती है, किसी विदेशी विश्वविद्यालय की व्यवस्था के बारे में पढ़ सकती है और अपनी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे मित्र के अनुभव से उसकी तुलना कर सकती है।
उसकी दुनिया गाँव और शहर के बीच सीमित नहीं है। उसकी तुलना केवल अपने जिले से नहीं होती। वह भारत की तुलना दुनिया से करता है। यही कारण है कि आज का युवा यह नहीं पूछता कि “हमारे यहाँ पहले से कुछ बेहतर हुआ है या नहीं।” वह पूछता है— “दुनिया में जो संभव है, भारत में वह मेरे लिए क्यों संभव नहीं?” यह मानसिकता राजनीतिक रूप से बहुत बड़ी घटना है।
*पुरानी राजनीति का संकट: मुद्दे वही, प्राथमिकताएँ बदल रही हैं*
भारतीय राजनीति लंबे समय से धार्मिक पहचान, जातीय समीकरण, क्षेत्रीय अस्मिता, राष्ट्रवाद, मंदिर-मस्जिद और समुदाय-आधारित लामबंदी के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
इन मुद्दों की अपनी सामाजिक और ऐतिहासिक वास्तविकता है। उन्हें कृत्रिम या महत्वहीन बताना भी गलत होगा। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब राजनीति नागरिक के रोजमर्रा के प्रश्नों को लगातार प्रतीकात्मक मुद्दों के नीचे दबा देती है। युवा पूछ रहा है—
* मंदिर भी रहे, लेकिन विश्वविद्यालय कैसा रहेगा?
* राष्ट्रवाद भी रहे, लेकिन रोजगार कहाँ है?
* धर्म भी रहे, लेकिन परीक्षा निष्पक्ष कौन करेगा?
* जातीय पहचान भी रहे, लेकिन अवसर का न्याय कौन सुनिश्चित करेगा?
युवाओं के इस बदलते प्रश्न को समझने के लिए यह देखना होगा कि वे पुराने मुद्दों का पूर्ण निषेध नहीं कर रहे; वे उनके ऊपर अपने जीवन के प्रश्नों की प्राथमिकता स्थापित करना चाहते हैं। यही फर्क महत्वपूर्ण है।
यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि भारत की पूरी युवा पीढ़ी अब हिंदू-मुसलमान, अगड़ा-पिछड़ा या मंदिर-मस्जिद की राजनीति को खारिज कर चुकी है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है।
* आज का युवा भी विविध है।
* उसमें धार्मिक युवा हैं।
* जातीय पहचान से जुड़े युवा हैं।
* राष्ट्रवादी युवा हैं।
* उदारवादी और वामपंथी युवा हैं।
* आंबेडकरवादी, समाजवादी, पर्यावरणवादी और क्षेत्रीय पहचान से जुड़े युवा भी हैं।
इसलिए “Gen Z एक विचारधारा है”—यह निष्कर्ष भी गलत होगा। लेकिन इसके बावजूद एक साझा प्रवृत्ति उभर रही है—”वह सत्ता से परिणाम मांग रही है।”
*जंतर-मंतर से रांची तक—एक धागा दिखाई देता है*
दिल्ली के जंतर-मंतर का छात्र आंदोलन और झारखंड के रांची में परीक्षा तथा भर्ती संबंधी कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहा आंदोलन दो बिल्कुल अलग राजनीतिक परिस्थितियों के उत्पाद हैं। लेकिन दोनों में एक समान धागा दिखाई देता है— विश्वास का संकट।
दिल्ली में परीक्षा-व्यवस्था और युवाओं के भविष्य का प्रश्न राष्ट्रीय स्तर पर उभरा। अंततः 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया। उनके इस्तीफे को छात्र आंदोलन की प्रमुख मांगों में शामिल किया गया था।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है कि किसी एक मंत्री का पद छोड़ना अपने आप में सबसे बड़ा समाचार नहीं होता। असली समाचार यह है कि लाखों छात्रों के प्रश्नों ने सत्ता को राजनीतिक रूप से प्रतिक्रिया देने पर मजबूर किया।
रांची में 10 अगस्त को हजारों युवाओं ने कथित परीक्षा अनियमितताओं और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग को लेकर विधानसभा की ओर मार्च किया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए आंसू गैस, पानी की बौछार और लाठियों का इस्तेमाल किया। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार आंदोलन 25 जुलाई से जारी था और इसकी मांगों में परीक्षा प्रक्रिया में सुधार, कथित पेपर-लीक की जांच तथा कुछ परीक्षाओं को रद्द करने जैसी बातें शामिल थीं।
दिल्ली और रांची की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं हैं। लेकिन युवा मन में प्रश्न समान है—”मेरी मेहनत का भरोसा कौन देगा?”
*आज का युवा केवल “अपनी नौकरी” के लिए नहीं लड़ रहा*
इस नई राजनीतिक चेतना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यहीं है। किसी प्रतियोगी परीक्षा के अभ्यर्थी का आंदोलन स्वाभाविक रूप से उसके अपने भविष्य से शुरू होता है। लेकिन वह जल्दी ही व्यापक नागरिक प्रश्न में बदल सकता है।
* एक छात्र कहता है—“आज किसी और की परीक्षा लीक हुई है।”
* फिर दूसरा छात्र कहता है—“कल मेरी होगी।”
* और तीसरा कहता है—“इसलिए व्यवस्था ही बदलनी चाहिए।”
यहीं व्यक्तिगत पीड़ा से सार्वजनिक चेतना जन्म लेती है। इसीलिए यह मान लेना पर्याप्त नहीं कि जो छात्र आंदोलन कर रहा है, वह केवल किसी विशेष परीक्षा का उम्मीदवार है।
उसमें ऐसे युवा भी शामिल हो सकते हैं जिन्होंने वह परीक्षा दी ही न हो, लेकिन वे व्यवस्था के उसी संकट को अपने भविष्य का संभावित संकट मानते हैं। यह राजनीतिक चेतना का महत्वपूर्ण रूप है।
*नई पीढ़ी की सबसे बड़ी ताकत उसका सूचना-संसार है*
पुरानी पीढ़ियों के राजनीतिक अनुभव में सूचना प्रायः एकतरफा थी। अखबार कुछ गिने-चुने थे। टेलीविजन सीमित था। सरकारी सूचना का संस्थागत वर्चस्व अधिक था। आज युवा के पास सैकड़ों स्रोत हैं।
* वह सरकार की प्रेस विज्ञप्ति भी देखता है और विरोध करने वाले छात्र का वीडियो भी।
* वह संसद की बहस भी देख सकता है और उसी घटना का मोबाइल फुटेज भी।
* वह आधिकारिक आंकड़ा पढ़ सकता है और उसके साथ किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट भी देख सकता है। इसलिए नई पीढ़ी को केवल भाषण से संतुष्ट करना कठिन है। उसे प्रमाण चाहिए।
यही कारण है कि आज सत्ता के लिए “नैरेटिव” बनाना जितना जरूरी दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण विश्वसनीयता बनाना हो गया है।
*लेकिन यहां राजनीतिक रोमांटिसिज्म से बचना होगा*
युवा जाग रहा है—यह बात प्रेरणादायक है। लेकिन यह मान लेना कि जागा हुआ हर युवा स्वतः लोकतांत्रिक, उदार, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील होगा—यह भी राजनीतिक रोमांटिसिज्म होगा।
नई पीढ़ी के पास आज सूचना अधिक है, लेकिन सूचना और विवेक एक ही चीज नहीं हैं। सोशल मीडिया ने राजनीतिक भागीदारी आसान की है, लेकिन उसी ने misinformation, echo chambers और डिजिटल भीड़ को भी जन्म दिया है।
अतः युवा आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संख्या नहीं, उसकी लोकतांत्रिक परिपक्वता होगी।
यदि आंदोलन तथ्य पर आधारित रहेगा, शांतिपूर्ण रहेगा, अहिंसक रहेगा और अपने प्रश्नों को संस्थागत सुधार से जोड़ेगा, तो वह देश की लोकतांत्रिक संस्कृति को मजबूत करेगा।
यदि वह हिंसा, अफवाह, डिजिटल भीड़ और व्यक्तिपूजा का रूप लेगा, तो वही आंदोलन अपनी नैतिक शक्ति खो सकता है। इसलिए युवाओं को केवल उत्साह नहीं चाहिए। उन्हें लोकतांत्रिक अनुशासन भी चाहिए।
*क्या राजनीतिक दल सचमुच डर रहे हैं?*
यह कहना कि देश की सभी पार्टियाँ Gen Z से “डर गई हैं”, शायद अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना बिल्कुल उचित है कि राजनीतिक दल युवा मुद्दों की बढ़ती राजनीतिक शक्ति को गंभीरता से ले रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में युवाओं के लिए एकीकृत युवा नीति और संभावित युवा आयोग की दिशा में सरकारी पहल तथा प्रशासनिक अधिकारियों को विद्यार्थियों के साथ नियमित संवाद के लिए निर्देश इस बदलते राजनीतिक वातावरण का एक संकेत है।
ऐसी नीति की वास्तविक सफलता हालांकि इस बात से तय होगी कि वह केवल सरकारी कार्यक्रमों की सूची बनकर रह जाती है या रोजगार, कौशल, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल साक्षरता, उद्यमिता और राजनीतिक भागीदारी के ठोस संस्थागत ढाँचे तैयार करती है।
* युवा नीति का अर्थ युवाओं के साथ फोटो खिंचवाना नहीं।
* युवा नीति का अर्थ है—”उनकी समस्याओं को नीति-निर्माण का केंद्र बनाना।”
*प्रधानमंत्री का संदेश: सवाल भी करो, समाधान भी दो*
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में IIT दिल्ली के दीक्षांत समारोह में युवाओं से संवाद करते हुए उनके प्रश्नों और समाधान क्षमता पर जोर दिया। IIT Delhi का 2026 दीक्षांत समारोह 8 अगस्त को निर्धारित था। “सवाल पूछने” और “समाधान देने” के बीच प्रधानमंत्री की बात का लोकतांत्रिक महत्व है।
लोकतंत्र केवल शिकायत का मंच नहीं हो सकता। लेकिन उसका उल्टा भी उतना ही सत्य है—”समाधान का दायित्व केवल शिकायतकर्ता पर नहीं डाला जा सकता।” युवा यदि कहता है कि परीक्षा व्यवस्था विफल है, तो सरकार का उत्तर केवल यह नहीं होना चाहिए कि “आप समाधान बताइए।”
* सरकार के पास संस्थान हैं।
* विशेषज्ञ हैं।
* बजट है।
* प्रशासनिक संरचना है।
* जांच एजेंसियाँ हैं।
* कानून बनाने की शक्ति है।
इसलिए युवा प्रश्न पूछे और सरकार समाधान प्रस्तुत करे—यही लोकतांत्रिक भूमिका-विभाजन अधिक स्वस्थ है। युवा आलोचक भी हो सकता है और समाधान का भागीदार भी।
*राहुल गांधी ने युवा राजनीति की इस बदलती जमीन को पढ़ लिया है*
*इस बदलती राजनीतिक परिस्थिति को विपक्ष ने भी समझा है।*
राहुल गांधी की “छात्रों की गूंज” पहल इसी प्रयास का हिस्सा है। कांग्रेस ने 2026 में कोटा, प्रयागराज, देहरादून और अन्य शहरों में छात्रों के साथ प्रत्यक्ष संवाद के कार्यक्रम आयोजित किए तथा परीक्षा अनियमितताओं, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखने की कोशिश की।
प्रयागराज में इस कार्यक्रम से पहले राजनीतिक पोस्टरबाजी और उसके बाद छात्र भागीदारी ने भी संकेत दिया कि युवा प्रश्न अब विपक्ष और सत्ता दोनों के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय बन चुका है। लेकिन यहां राहुल गांधी के लिए भी परीक्षा आसान नहीं है।
युवा के साथ मंच साझा करना राजनीति है। उसका विश्वास अर्जित करना उससे बड़ी राजनीति है। और उसका विश्वास बनाए रखना उससे भी कठिन। कांग्रेस यदि सचमुच युवा राजनीति की नई धुरी बनना चाहती है तो उसे केवल सरकार-विरोधी मंच नहीं, एक विश्वसनीय युवा नीति भी पेश करनी होगी।
* कितनी नौकरियाँ?
* किन क्षेत्रों में?
* शिक्षा का वित्तपोषण कितना?
* विश्वविद्यालय की स्वायत्तता कैसे?
* परीक्षा-प्रणाली में सुधार कैसे?
* AI और automation से रोजगार पर प्रभाव का समाधान क्या?
* युवा महिलाओं की श्रम भागीदारी कैसे बढ़े?
* स्टार्टअप से आगे sustainable employment कैसे बने?
सवाल अब नारों से नहीं रुकेंगे।
*भाजपा के सामने भी एक ऐतिहासिक चुनौती है*
भाजपा ने पिछले एक दशक में युवाओं को विकास, तकनीक, स्टार्टअप, राष्ट्रवाद और आकांक्षी भारत की भाषा से जोड़ा है। उस राजनीति की अपनी उपलब्धियाँ हैं और उसका बड़ा सामाजिक आधार भी है। लेकिन अब उसी राजनीति की सबसे कठिन परीक्षा हो रही है। जब युवा सरकार के सामने खड़ा होकर पूछता है—
* “मेरी परीक्षा क्यों लीक हुई?”
* “मेरी भर्ती क्यों रुकी?”
* “मुझे नौकरी कब मिलेगी?”
* “मेरे विश्वविद्यालय की फीस क्यों बढ़ी?”
तो इसका उत्तर केवल यह नहीं हो सकता कि भारत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो रहा है।
राष्ट्र की GDP और नागरिक के व्यक्तिगत भविष्य के बीच पुल बनाना सरकार का काम है। यदि वह पुल कमजोर है, तो macroeconomic success का राजनीतिक लाभ सीमित हो जाएगा। युवा केवल देश के बड़े होने से संतुष्ट नहीं होगा। वह यह भी पूछेगा—”इस बड़े होते भारत में मेरा भविष्य कितना बड़ा हुआ?”
*नई पीढ़ी की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता—वह संस्थाओं पर प्रश्न उठा रही है*
युवाओं की वर्तमान बेचैनी का अगला चरण शायद सबसे महत्वपूर्ण होगा।
* आज प्रश्न केवल सरकार से नहीं है।
* परीक्षा एजेंसियों से है।
* विश्वविद्यालय प्रशासन से है।
* पुलिस से है।
* नियामक संस्थाओं से है।
* नौकरशाही से है।
* न्याय व्यवस्था की गति से है।
* और कभी-कभी राजनीतिक दलों से भी।
यानी यह केवल सरकार-विरोधी असंतोष नहीं है। यह संस्थागत जवाबदेही की मांग है और यही इस उभरती चेतना को लंबे समय में अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। भारत का लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब उसकी अगली पीढ़ी संविधान को केवल पुस्तक में नहीं, संस्थाओं के व्यवहार में देखेगी।
* उसे अधिकारों के साथ प्रक्रिया चाहिए।
* उसे भाषण के साथ न्याय चाहिए।
* उसे चुनाव के साथ जवाबदेही चाहिए।
* उसे विकास के साथ अवसर चाहिए।
*Gen Alpha की कहानी अभी शुरू ही हुई है*
Gen Alpha की लगभग 33 करोड़ आबादी है। इस संख्या को अंतिम तथ्य मानना अभी उचित नहीं होगा, क्योंकि भारत के पास 2026 तक इस पीढ़ी का कोई आधिकारिक पृथक जनगणना वर्गीकरण उपलब्ध नहीं है। लेकिन व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति को नज़रअंदाज़ करना भी कठिन है। जो बच्चे आज माध्यमिक विद्यालय में पहुँच रहे हैं, वे पहले से डिजिटल, AI-संपन्न और वैश्विक सूचना-संसार में बड़े हो रहे हैं।
आज का कक्षा-6 का बच्चा भविष्य की परीक्षा व्यवस्था के बारे में सोच रहा है—यह किसी एक व्यक्ति की तस्वीर भर नहीं, बदलते सामाजिक वातावरण का संकेत है। लेकिन यहाँ भी सावधानी जरूरी है।
बच्चे की राजनीतिक अभिव्यक्ति को सीधे “राजनीतिक आंदोलन” कह देना उचित नहीं। उसे बाल नागरिकता, शिक्षा, डिजिटल समाजीकरण और परिवार तथा मीडिया के प्रभाव के संदर्भ में समझना होगा।
* Gen Alpha की राजनीति अभी बन रही है।
* Gen Z उसकी प्रस्तावना लिख रही है।
*भारत की राजनीति में अब “वोटर” नहीं, “सिटिजन” लौट रहा है*
भारतीय लोकतंत्र में लंबे समय तक मतदाता को चुनावी इकाई की तरह देखा गया।
* जाति कितनी है?
* समुदाय कितना है?
* किस वर्ग का कितना वोट?
* कौन-सा मुद्दा किस बूथ पर असर करेगा?
अब युवा धीरे-धीरे इस गणित के बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। वह पूछता है—
* “आप मुझे वोटर क्यों समझते हैं?”
* “मुझे नागरिक की तरह क्यों नहीं देखते?”
यही परिवर्तन लोकतंत्र की आत्मा को पुनर्जीवित कर सकता है। क्योंकि नागरिक केवल चुनाव के दिन सक्रिय नहीं होता।
* वह सरकार के काम पर निगरानी रखता है।
* वह प्रश्न पूछता है।
* वह विरोध करता है।
* वह अदालत जाता है।
* वह सूचना मांगता है।
* वह नीति पर बहस करता है।
* और अंततः वह मतदान करता है।
*यह परिवर्तन किसी एक नेता के नेतृत्व की प्रतीक्षा नहीं कर रहा*
युवाओं के वर्तमान उभार को राहुल गांधी के खाते में डाल देना भी भूल होगी और नरेंद्र मोदी के खिलाफ स्वतःस्फूर्त लहर घोषित करना भी।
यह आंदोलन किसी एक नेता से बड़ा हो सकता है। युवा आज किसी नेता का अनुयायी बनने से पहले उसके काम का मूल्यांकन करना चाहता है। वह समर्थन कर सकता है। अगले वर्ष आलोचना कर सकता है।
एक चुनाव में किसी पार्टी को वोट दे सकता है और अगले चुनाव में दूसरी को। यही कारण है कि नई पीढ़ी की राजनीति अधिक तरल हो सकती है। इसके केंद्र में व्यक्ति की स्थायी निष्ठा के बजाय मुद्दे की अस्थायी प्राथमिकता हो सकती है।
* आज रोजगार।
* कल शिक्षा।
* परसों पर्यावरण।
* फिर सामाजिक न्याय।
* और उसके बाद संस्थागत स्वतंत्रता।
इस राजनीति को समझने के लिए पुराने जातीय और धार्मिक चुनावी फार्मूले पर्याप्त नहीं होंगे।
*लेकिन इस युवा ऊर्जा को दिशा कौन देगा?*
यह सबसे बड़ा प्रश्न है; क्योंकि बेचैनी अपने आप परिवर्तन नहीं बनती।
* उसके लिए संगठन चाहिए।
* विचार चाहिए।
* नीति चाहिए।
* लोकतांत्रिक प्रशिक्षण चाहिए।
* और सबसे महत्वपूर्ण—दीर्घकालीन दृष्टि चाहिए।
*यदि युवा असंतोष केवल सोशल मीडिया trend बनकर रह गया, तो वह कुछ दिनों बाद किसी दूसरे trend में बदल जाएगा।*
*यदि वह केवल चुनावी भीड़ बन गया, तो पुराने दल उसे अपने-अपने झंडे में समेट लेंगे।*
*यदि वह केवल सरकार-विरोध तक सीमित रहा, तो सत्ता बदलने के बाद उसके प्रश्न फिर वही रहेंगे।*
लेकिन यदि यह ऊर्जा संस्थागत सुधारों, शिक्षा के लोकतंत्रीकरण, भर्ती पारदर्शिता, न्यायिक सुधार, रोजगार नीति, स्थानीय लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों से जुड़ती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के एक नए अध्याय का आधार बन सकती है।
*राष्ट्रहित में सरकारों को अब युवा को “manage” नहीं, “empower” करना होगा*
* युवाओं की समस्या आंदोलन को रोकना नहीं है। आंदोलन के कारण को खत्म करना है।
* पुलिस भेजकर भीड़ हटाई जा सकती है। लेकिन बेरोजगारी नहीं हटती।
* बैरिकेड लगाकर विधानसभा का घेराव रोका जा सकता है। लेकिन परीक्षा पर अविश्वास नहीं रुकता।
सोशल मीडिया पर सरकार अपनी उपलब्धियाँ बता सकती है। लेकिन छात्र की मार्कशीट बदल नहीं सकती। इसीलिए भविष्य की सरकारों का सबसे महत्वपूर्ण मंत्र होना चाहिए— “prevent protest by solving problems, not by preventing protest.” यानी आंदोलन होने से पहले समस्या का समाधान कीजिए।
*लोकतंत्र की अगली बड़ी परीक्षा*
आज का युवा शायद अपने माता-पिता से केवल यह नहीं पूछ रहा कि “सरकार किसकी है?”
वह पूछ रहा है— “सरकार कैसी है?”
और यही बदलाव है।
सरकार का मूल्यांकन उसकी विचारधारा से होगा, लेकिन साथ ही उसकी प्रशासनिक क्षमता से भी। पार्टी के घोषणापत्र से होगा, लेकिन उसके भर्ती कैलेंडर से भी। भाषण से होगा, लेकिन परीक्षा के प्रश्नपत्र की सुरक्षा से भी। विकास के दावों से होगा, लेकिन विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला और छात्र की फीस से भी। राष्ट्रवाद के नारों से होगा, लेकिन नागरिक के अधिकारों की रक्षा से भी। यही नई राजनीति की संभावित बुनियाद है।
*अंततः देश की अंगड़ाई को समझना होगा*
भारत सचमुच बदल रहा है या नहीं, इसका अंतिम फैसला अभी नहीं दिया जा सकता।
* यह भी संभव है कि वर्तमान युवा आंदोलन समय के साथ बिखर जाएँ।
* यह भी संभव है कि राजनीतिक दल उन्हें अपने-अपने खेमों में समाहित कर लें।
यह भी संभव है कि रोजगार, परीक्षा और शिक्षा के कुछ संकटों के हल के बाद वर्तमान बेचैनी कम हो जाए। लेकिन एक बात अब पहले जैसी नहीं रहेगी— युवा प्रश्न पूछना सीख चुका है। और प्रश्न पूछने वाला नागरिक लोकतंत्र को बदल सकता है।
* आज जंतर-मंतर है।
* आज रांची है।
* आज प्रयागराज है।
कल कोई और शहर होगा। पर यदि इन स्थानों की आवाज एक व्यापक नागरिक प्रश्न में बदल गई— तो भारतीय राजनीति को केवल चेहरे नहीं बदलने पड़ेंगे। उसे अपना चरित्र बदलना पड़ेगा। यह किसी एक पार्टी की हार या किसी दूसरी की जीत का प्रश्न नहीं होगा। यह उस भारत का प्रश्न होगा जहाँ नागरिक को जाति, धर्म, क्षेत्र और राजनीतिक निष्ठा से पहले नागरिक माना जाएगा।
* जहाँ छात्र की मेहनत का सम्मान होगा।
* जहाँ परीक्षा की ईमानदारी राजनीतिक इच्छा पर निर्भर नहीं होगी।
* जहाँ रोजगार चुनावी वादा नहीं, राज्य की आर्थिक प्राथमिकता होगा।
* जहाँ विश्वविद्यालय ज्ञान के मंदिर होंगे, राजनीतिक नियंत्रण के केंद्र नहीं,
* जहाँ पुलिस कानून की शक्ति होगी, सत्ता की भाषा नहीं।
युवा शायद अभी किसी क्रांति की घोषणा नहीं कर रहा। वह उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण काम कर रहा है—”वह पुराने राजनीतिक प्रश्नों से नए राजनीतिक प्रश्न पूछ रहा है।” यही किसी बड़े परिवर्तन की शुरुआत होती है।
“देश की नई पीढ़ी अभी सत्ता बदलने की घोषणा नहीं कर रही; वह पहले राजनीति का सवाल बदल रही है—और जिस दिन सवाल बदल जाते हैं, उस दिन लोकतंत्र के जवाब भी बदलने पड़ते हैं।”




