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रामपुर में बुलडोज़र, राजनीति में संदेश

"जौहर विश्वविद्यालय पर कार्रवाई कानून की कसौटी है, या सत्ता की भाषा"?

उत्तर प्रदेश के रामपुर में मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के 38 भवनों पर ध्वस्तीकरण की तैयारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई केवल भवन-नियमों के उल्लंघन का मामला है, या यह भारतीय राजनीति में सत्ता, प्रतिशोध, संस्थागत निष्पक्षता और अल्पसंख्यक-संवेदनशीलता की बहस का नया अध्याय बन गई है। रामपुर विकास प्राधिकरण के अनुसार विश्वविद्यालय परिसर की 40 इमारतों में से 38 बिना स्वीकृत नक़्शे के बनाई गईं, और पहले नोटिस तथा 15 दिन की समयसीमा के बाद अब कार्रवाई की बात की जा रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन और आज़म ख़ान के समर्थक इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रहे हैं, जबकि सरकार का पक्ष है कि मामला पूरी तरह क़ानूनी और नियामकीय है।

लेकिन इस विवाद को केवल एक अवैध निर्माण या नक़्शा-स्वीकृति के तकनीकी प्रश्न तक सीमित कर देना सरलीकरण होगा। मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को आज़म ख़ान ने वर्षों तक अपना “ड्रीम प्रोजेक्ट” बताया और विश्वविद्यालय की अपनी वेबसाइट भी इसे 2006 में स्थापित संस्था बताती है; यह वही परियोजना है जो UP Act 19 of 2006 के तहत अस्तित्व में आई और जिसे विश्वविद्यालय के अपने विवरण के अनुसार 16 जून 2006 को राज्यपाल की मंज़ूरी मिली थी। यानी यह मामला केवल एक इमारत या एक परिसर का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक-आकांक्षा का भी है जिसे आज़म ख़ान ने शिक्षा, पहचान और सामुदायिक उन्नयन से जोड़कर पेश किया था।

यहीं से इस प्रकरण का राजनीतिक अर्थ और अधिक तीखा हो जाता है। शिक्षा किसी भी समाज में केवल पढ़ाई का ढाँचा नहीं होती; वह सामाजिक गतिशीलता, आत्मसम्मान और भविष्य की आशा का संस्थागत रूप होती है। इसीलिए जब किसी विश्वविद्यालय पर बुलडोज़र की आशंका मंडराती है, तो वह केवल ईंट-पत्थर पर चोट नहीं होती, बल्कि उस भरोसे पर भी चोट होती है जो छात्र, अभिभावक और स्थानीय समाज अपने शैक्षणिक संस्थानों पर रखते हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार प्रशासन ने छात्रों की चिंता कम करने के लिए विश्वविद्यालय परिसर के मुख्य द्वार पर काउंसलिंग केंद्र तक खोल दिया है, जो इस बात का संकेत है कि असल संकट केवल नियामकीय नहीं, मनोवैज्ञानिक भी है।

प्रशासन का पक्ष यह है कि केवल दो भवन—मेडिकल कॉलेज और अकादमिक ब्लॉक—को स्वीकृति मिली थी, जबकि शेष ढाँचों के लिए वैध नक़्शा मंज़ूर नहीं था। इधर विश्वविद्यालय के समर्थक यह दलील दे रहे हैं कि जिन इमारतों को अब अवैध बताया जा रहा है, वे उस समय बनीं जब यह क्षेत्र रामपुर विकास प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में नहीं था और तब वह ज़िला पंचायत के अधीन था; प्रशासन के अपने दावे के अनुसार बाद में 2024 में यह क्षेत्र RDA के अधीन आया। यदि यह तथ्यात्मक टकराव अदालत में जाता है, तो असली प्रश्न यही होगा कि पुराने निर्माणों पर नए नियामकीय दायरे को किस सीमा तक लागू किया जा सकता है और क्या प्रशासनिक सख़्ती न्यायिक कसौटी पर टिक पाएगी।

यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति, कानून और नैतिकता एक-दूसरे में उलझ जाते हैं। विपक्ष इसे सरकार की द्वेषपूर्ण कार्रवाई बता रहा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे शिक्षा के विरुद्ध राजनीतिक दुराग्रह करार दिया, जबकि अन्य विपक्षी नेताओं ने पूछा कि अगर अनुमति-प्रक्रिया ही पैमाना है, तो फिर देश के दूसरे संस्थानों, कार्यालयों और सार्वजनिक इमारतों की भी समान जांच क्यों नहीं होती। यह प्रश्न केवल बयानबाज़ी नहीं है; यह उस समानता के सिद्धांत से जुड़ा है, जो कानून के शासन की मूल आत्मा है। कानून यदि सबके लिए एक है, तो उसकी भाषा भी एक-सी होनी चाहिए; और यदि कानून चयनात्मक लगे, तो उसके पीछे की राजनीति भी बहस के केंद्र में आ जाती है।

रामपुर की इस कार्रवाई का सबसे संवेदनशील पक्ष विश्वविद्यालय में पढ़ रहे लगभग तीन हज़ार छात्रों का भविष्य है। प्रशासन ने उनके लिए शिक्षक-टीम, काउंसलिंग और मार्गदर्शन की व्यवस्था की है, ताकि भय का वातावरण कम किया जा सके। यह व्यवस्था अपने-आप में आवश्यक है, लेकिन यह भी सच है कि छात्रों के मन में केवल स्थान-परिवर्तन की चिंता नहीं, बल्कि शैक्षणिक निरंतरता, मान्यता, परीक्षा और डिग्री की वैधता को लेकर भी अनिश्चितता पैदा हो रही है। किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की प्राथमिक ज़िम्मेदारी यह होनी चाहिए कि वह विद्यार्थियों को दंडात्मक राजनीति की collateral damage न बनाए।

आज़म ख़ान और जौहर विश्वविद्यालय का रिश्ता भी इस विवाद को भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर जटिल बनाता है। यह वही परियोजना है जिसे उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद अली जौहर को श्रद्धांजलि और शिक्षा-वंचित तबकों तक उच्च शिक्षा पहुँचाने के साधन के रूप में पेश किया था। परंतु जब एक परियोजना राजनीतिक प्रतीक बन जाए, तो उसकी वैधता, ज़मीन, निर्माण और प्रशासन—चारों पर समान रूप से कठोर निगाह पड़ती है। यही लोकतंत्र की विडंबना भी है और कसौटी भी: बड़े सपने भी केवल भावनाओं से नहीं, कानूनी प्रक्रियाओं से टिकते हैं।

इसलिए इस विवाद को न तो केवल “राजनीतिक प्रतिशोध” कहकर समाप्त किया जा सकता है, और न ही केवल “क़ानून का पालन” कहकर उसकी राजनीतिक संवेदनशीलता मिटाई जा सकती है। एक सच्चे लोकतंत्र में प्रशासन को यह सिद्ध करना होगा कि कार्रवाई चुनिंदा नहीं, समान है; पारदर्शी है, पूर्वाग्रहित नहीं; और नियम-आधारित है, प्रतिशोध-आधारित नहीं। दूसरी ओर विपक्ष और विश्वविद्यालय पक्ष को भी यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षा के नाम पर कोई भी संरचना कानून से ऊपर नहीं हो सकती। जो संस्थान समाज के लिए आदर्श बनना चाहते हैं, उन्हें निर्माण की वैधता में भी आदर्श प्रस्तुत करना होगा।

असल सवाल अब यह नहीं है कि जौहर विश्वविद्यालय की कितनी इमारतें गिरेंगी। असली सवाल यह है कि क्या भारत में संस्थाओं को राजनीतिक संदर्भ से अलग रखकर, निष्पक्ष मानकों पर आंका जा सकता है? यदि उत्तर हाँ है, तो यही लोकतंत्र की जीत होगी। और यदि उत्तर नहीं है, तो बुलडोज़र केवल भवन नहीं गिराएगा—वह भरोसे की ईंटें भी उखाड़ देगा।

“जब कानून का हाथ सबके लिए एक-सा दिखे, तभी जनता मानेगी कि बुलडोज़र राजनीति का नहीं, न्याय का औज़ार है।”

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