क्या अब छात्रों से भी डरती है सत्ता?
"जब संसद चुप हो जाए, तब सड़क बोलती है। जब सड़क को भी लाठियों से जवाब मिले, तब लोकतंत्र अपने सबसे कठिन इम्तिहान में प्रवेश कर जाता है।"
20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद तक मार्च का आह्वान केवल एक प्रदर्शन नहीं था; वह उस पीढ़ी की दस्तक थी जो बार-बार पेपर लीक, परीक्षा अनियमितताओं, महंगी शिक्षा और बेरोज़गारी के बीच अपना भविष्य तलाश रही है। लेकिन जिस तरह यह आंदोलन अगले ही दिन और अधिक व्यापक हुआ, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि सरकार ने केवल भीड़ को नहीं, जनभावना को भी कम करके आँका।
दिल्ली से नागपुर तक, जंतर-मंतर से संघ मुख्यालय तक, और अनेक राज्यों में फैले विरोध ने यह संकेत दिया कि मामला अब केवल शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान तक सीमित नहीं रहा। विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री आवास तक पहुँचकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफ़े की मांग करना भारतीय संसदीय राजनीति का असाधारण क्षण है। यह केवल राजनीतिक प्रतिरोध नहीं, शासन की जवाबदेही पर खुली चुनौती है।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पक्ष राजनीति नहीं, पुलिस कार्रवाई के आरोप हैं। अनेक वीडियो, प्रत्यक्षदर्शी बयान और सार्वजनिक दावे सामने आए हैं कि प्रदर्शनकारियों के साथ बल प्रयोग हुआ, जिनमें छात्राएँ भी शामिल थीं। इन दावों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जाँच आवश्यक है। यदि किसी भी स्तर पर अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है, तो वह केवल प्रशासनिक गलती नहीं, संवैधानिक जवाबदेही का विषय है।
लोकतंत्र में विरोध कोई अपराध नहीं है। “भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है”, यद्यपि यह अधिकार विधिसम्मत सीमाओं के अधीन है। इसलिए राज्य का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि शांतिपूर्ण असहमति का सम्मान हो। लोकतंत्र की शक्ति असहमति को सुनने में है, उसे कुचलने में नहीं।
सरकार का पक्ष भी सामने है। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का कहना है कि विपक्ष छात्रों के मुद्दे का राजनीतिक उपयोग कर रहा है और संसद में चर्चा के बजाय टकराव चाहता है। यदि सरकार वास्तव में चर्चा के लिए तैयार थी, तो सबसे सरल रास्ता यही था कि संसद में विस्तृत बहस कराई जाती। लोकतंत्र में बहस से बड़ा उत्तर कोई नहीं होता। यदि विपक्ष अतिशयोक्ति कर रहा है, तो संसद उसके दावों की परीक्षा का सबसे उपयुक्त मंच है। यदि सरकार सही है, तो उसे बहस से डरना नहीं चाहिए।
यही वह प्रश्न है जो सरकार का लगातार पीछा कर रहा है—”जब हर बड़े राष्ट्रीय विवाद पर संवाद की माँग उठती है, तब सत्ता सड़क और सुरक्षा-व्यवस्था को प्राथमिक उत्तर क्यों बना देती है?” किसान आंदोलन से लेकर महिला पहलवानों के आंदोलन तक और अब छात्रों के आंदोलन तक, यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि सरकार आलोचना को लोकतांत्रिक अवसर नहीं, प्रशासनिक चुनौती के रूप में देखती है।
और यहीं से संकट गहरा हो जाता है। क्योंकि जब सरकार विरोध को केवल सुरक्षा का विषय बना देती है और विपक्ष हर आंदोलन को सरकार-विरोध का जनमत-संग्रह बना देता है, तब सबसे बड़ा नुकसान उस वर्ग का होता है जिसके नाम पर पूरा संघर्ष खड़ा हुआ था—छात्रों का।
देश के लाखों विद्यार्थी इस समय किसी राजनीतिक नारे से अधिक एक विश्वसनीय परीक्षा प्रणाली चाहते हैं। उन्हें न तो सत्ता परिवर्तन की बहस से सीधा लाभ मिलेगा, न ही केवल धरनों से। उन्हें चाहिए—पेपर लीक पर कठोर कार्रवाई, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, और ऐसा शासन जो उनकी बात सुने।
आज संसद के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि किसने किसे हिरासत में लिया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था छात्रों के भविष्य पर गंभीर बहस करने को तैयार है। यदि संसद भी इस प्रश्न से बचती है, तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवाज़ फिर सड़क ही बनेगी।
सत्ता को यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकारें बहुमत से बनती हैं, लेकिन वैधता जनता के विश्वास से मिलती है। और जनता का विश्वास पुलिस की बैरिकेडिंग से नहीं, न्यायपूर्ण व्यवहार, संवाद और पारदर्शिता से अर्जित होता है।
इतिहास बताता है कि युवा आंदोलनों को बलपूर्वक दबाया जा सकता है, पर समाप्त नहीं किया जा सकता। हर लाठी आंदोलन को कुछ समय के लिए रोक सकती है; हर संवाद उसे समाधान की ओर ले जा सकता है। चुनाव सरकारें जीतती हैं, लेकिन भविष्य छात्रों की पीढ़ियाँ बनाती हैं। यदि वही पीढ़ी व्यवस्था पर विश्वास खो दे, तो यह किसी एक सरकार की नहीं, पूरे राष्ट्र की पराजय होगी।
सरकार यदि सचमुच शिक्षा सुधार चाहती है तो उसे बहस से नहीं, बहस की अनुपस्थिति से डरना चाहिए। विपक्ष यदि सचमुच छात्रों के साथ है, तो उसे आंदोलन को समाधान तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। और संसद यदि लोकतंत्र का मंदिर है, तो सबसे पहले वहीं छात्रों की आवाज़ सुनाई देनी चाहिए।
आज का प्रश्न :- “क्या भारत अपने छात्रों को उत्तर देगा, या केवल बैरिकेड?”
“जिस दिन छात्र न्याय माँगने से डर जाएँ, उसी दिन लोकतंत्र सत्ता से नहीं, अपने भविष्य से हार जाता है।”



