2011 में छिनी नौकरी, 2026 में हाईकोर्ट ने लौटाई—15 साल की कानूनी लड़ाई के बाद कर्मचारी को मिली सेवा में वापसी

टोंक । (ब्यूरो चीफ प्रिया गौत्तम) अधिवक्ता आर.के. गौत्तम एवं जी.एस. गौत्तम की पैरवी में दायर याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कैलाश चंद रैगर को बड़ी राहत देते हुए वर्ष 2011 में की गई उनकी सेवा समाप्ति को निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति आनंद शर्मा ने 25 सितंबर 2026 को दिए फैसले में अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (एवीवीएनएल) द्वारा जारी सेवा समाप्ति आदेश और बाद में प्रतिनिधित्व खारिज करने वाले आदेश को रद्द करते हुए कर्मचारी को पुनः सेवा में लेने के निर्देश दिए।
मामले के अनुसार कैलाश चंद रैगर को उनके दिवंगत पिता के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति के तहत 25 मार्च 2011 को हेल्पर ग्रेड-II/प्यून के पद पर नियुक्त किया गया था। बाद में पुलिस सत्यापन में वर्ष 2008 के एक आपराधिक मामले की जानकारी सामने आने पर 24 नवंबर 2011 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। उक्त मामले में उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 147 के तहत दोषसिद्ध किया गया था, लेकिन प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 3 का लाभ देते हुए उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था।
कर्मचारी की ओर से हाईकोर्ट में तर्क दिया गया कि नियुक्ति के लिए भरे गए मूल आवेदन पत्र में पूर्व आपराधिक मामले की जानकारी देने की कोई शर्त या कॉलम ही नहीं था। इसके बावजूद बाद में आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने का आरोप लगाकर सेवा समाप्त कर दी गई। हाईकोर्ट ने भी पाया कि आवेदन पत्र में ऐसी जानकारी देने की कोई शर्त होने के तथ्य का प्रतिवादियों की ओर से खंडन नहीं किया गया।
न्यायालय ने प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट की धारा 12 का उल्लेख करते हुए कहा कि धारा 3 या 4 का लाभ प्राप्त करने वाले व्यक्ति को दोषसिद्धि से जुड़ी अयोग्यता नहीं भुगतनी होती। कोर्ट ने माना कि इस प्रावधान की अनदेखी करते हुए उक्त दोषसिद्धि को नियुक्ति के लिए अयोग्यता का आधार बनाना उचित नहीं था।
हाईकोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि वर्ष 2011 के मूल सेवा समाप्ति आदेश में तथ्य छिपाने का कोई आरोप नहीं लगाया गया था, जबकि वर्ष 2017 में प्रतिनिधित्व पर निर्णय लेते समय तथ्य छिपाने का नया आधार जोड़ा गया। न्यायालय ने इस नए आधार को बाद में जोड़ा गया आधार मानते हुए कानूनी रूप से अस्थिर माना।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पवन कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और उमेश चंद्र यादव बनाम इंस्पेक्टर जनरल एवं चीफ सिक्योरिटी कमिश्नर, आरपीएफ के निर्णयों का भी संदर्भ लिया गया। न्यायालय ने आपराधिक मामले की प्रकृति, पद की प्रकृति और कर्मचारी के कर्तव्यों को वस्तुनिष्ठ रूप से देखने के सिद्धांत पर भी विचार किया।
हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 24 नवंबर 2011 का सेवा समाप्ति आदेश और 20 फरवरी 2017 का प्रतिनिधित्व खारिज करने वाला आदेश निरस्त कर दिया। साथ ही एवीवीएनएल को कर्मचारी को उसी पद और उन्हीं शर्तों पर पुनः सेवा में लेने तथा सेवा में निरंतरता बनाए रखने के निर्देश दिए।
कर्मचारी को बीच की अवधि के लिए नॉशनल वेतन निर्धारण, वरिष्ठता आदि का लाभ भी मिलेगा। हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस अवधि का वास्तविक मौद्रिक लाभ देय नहीं होगा। आदेश की पालना प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के 60 दिनों के भीतर करने के निर्देश दिए गए हैं।




