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जंतर-मंतर की गूँज: मीडिया के छलावे, विपक्ष की जड़ता और सड़कों पर उभरता युवा आक्रोश

इतिहास के पन्नों पर दर्ज होता एक विरोध

संसद के मानसून सत्र के पहले दिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर देश की सोई हुई चेतना को झझकोरने का केंद्र बिंदु बन गया। दिल्ली की सड़कों पर हज़ारों युवाओं का यह जमावड़ा केवल एक तात्कालिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वर्षों से भीतर ही भीतर सुलग रहे आक्रोश का शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक विस्फोट था। दूर बैठकर भी यदि इस प्रतिरोध की परतों को उघाड़कर देखा जाए, तो सत्ता के दंभ, मुख्यधारा मीडिया की कुटिलता, विपक्ष की वैचारिक विकलांगता और युवाओं की बेबाक चेतना के कई महत्वपूर्ण पहलू परत-दर-परत सामने आते हैं।

1. स्वतःस्फूर्त युवा चेतना और ‘प्रतिरोध’ के नए प्रतीक

वर्षों के लंबे अंतराल के बाद दिल्ली ने युवाओं का ऐसा राष्ट्रीय और शांतिपूर्ण जन-प्रतिरोध देखा है। जब NEET जैसे घोटालों, 152 से अधिक पेपर लीक, आरक्षण में धांधली और घटते अवसरों से युवाओं का भविष्य अंधकारमय किया जा रहा हो, तब सड़कों पर यह सैलाब आना स्वाभाविक था।

* त्याग और प्रतिबद्धता: इस आंदोलन को किसी बड़ी राजनीतिक मशीनरी ने ऊर्जा नहीं दी, बल्कि JNU की शोधछात्रा नेहा बोरा जैसे युवाओं की निस्वार्थ भूमिका और 23 दिनों के जोखिम भरे अनशन ने देश भर के युवाओं को प्रेरित किया।

* दूर-दराज से भागीदारी: 20 जुलाई का यह प्रदर्शन सिद्ध करता है कि देश के कोने-कोने से आया युवा अब केवल व्यवस्था की मार सहने को तैयार नहीं है। वह अपने हक का हिसाब माँगने दिल्ली की दहलीज़ तक खुद का किराया लगाकर पहुँचा है।

2. ‘टीवीपुरम’ का षड्यंत्र और सत्ता की सहूलियत

मुख्यधारा मीडिया का एक बड़ा हिस्सा (टीवीपुरम) इस विशाल जन-आंदोलन को छोटा करके दिखाने और इसे गिने-चुने चेहरों तक सीमित करने के कुत्सित प्रयास में जुटा रहा।

“टीवी मीडिया और सत्ताधीश इस व्यापक छात्र आंदोलन को केवल ‘CJP’ या ‘सोनम वांगचुक’ के दायरे में समेटकर पेश करना चाहते हैं। यह एक सोची-समझी रणनीति है, ताकि आंदोलन को चंद चेहरों तक सीमित कर अपनी सहूलियत का कोई फार्मूला थोपा जा सके और इसे समाप्त कराया जा सके।”

यह सच है कि शुरुआत में कुछ संगठनों की भूमिका रही होगी और उनके नेतृत्व की आलोचना भी हुई, लेकिन आज का यह आंदोलन किसी एक संगठन या नेता के नियंत्रण से बहुत आगे निकल चुका है। यह ‘लीडरलेस’ (बिना नेता का) और ‘कॉज-ड्रिवन’ (मुद्दे पर आधारित) जनाक्रोश है, जिसे मीडिया की ढाल से ढका नहीं जा सकता।

3. बेरोजगारी, कुशासन और व्यवस्थागत सड़न का निचोड़

जब न्यायपालिका का कोई मंच युवाओं के दर्द को समझने के बजाय संवेदनहीन टिप्पणियाँ करे, जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग पर कान में तेल डाल लिया जाए, तो गुस्सा सड़कों पर ही फूटता है।

* मुद्दों की भरमार: यह आक्रोश केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है। यह यूपी से लेकर पूरे देश में फैले पेपर लीक, घूसखोरी, कुशासन और भर्ती प्रक्रियाओं की भारी अव्यवस्था के खिलाफ है।

* सियासी दस्तक: जब युवाओं का धैर्य जवाब दे गया, तो चंद्रशेखर रावण से लेकर डिंपल यादव जैसे नेताओं ने अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने में देर नहीं की। सांसद सड़कों पर उतरे, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह समर्थन केवल सियासी रस्म अदायगी है या युवाओं के साथ वाकई कोई खड़ा है?

4. कांग्रेस की वैचारिक जड़ता और राजनीतिक नासमझी

आंदोलनों के इतिहास में एक कड़वा सच यह भी है कि जब-जब सत्ता के खिलाफ जन-आक्रोश पनपता है, उसका सबसे बड़ा स्वाभाविक लाभार्थी मुख्य विपक्षी दल होता है। लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक समझ इस मामले में हास्यास्पद और निराशाजनक नज़र आती है।

* भ्रम और षड्यंत्र का जाल: कांग्रेस और उसके पैरोकार इस अंतहीन और व्यर्थ की खोज में उलझे रहते हैं कि “आंदोलन के पीछे कौन है?” वे यह समझने में पूरी तरह नाकाम हैं कि यह जनाक्रोश किसी के इशारे पर नहीं, बल्कि सत्ता की विफलता से पैदा हुआ है।

* ऐतिहासिक गलतियों का सबक: इतिहास गवाह है कि कैसे किसान आंदोलन जैसे बड़े जन-आंदोलनों का राजनीतिक लाभ उठाने के बजाय, कांग्रेस ने अपनी अंदरूनी गुटबाज़ी और राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण कई राज्यों में अपना ही जनाधार दफन कर लिया। आज भी यदि कांग्रेस इस युवा आंदोलन के मर्म को समझे बिना केवल असमंजस में बैठी रही, तो यह उसकी राजनीतिक लाचारी का अंतिम प्रमाण होगा।

सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए चेतावनी

जंतर-मंतर की सड़कों पर उमड़ी यह भीड़ केवल मोदी सरकार के 12 सालों की नीतियों पर एक कड़ा सवालिया निशान नहीं है, बल्कि यह पूरे राजनीतिक तंत्र को उखाड़ फेंकने की क्षमता रखने वाली युवा चेतना का आगाज़ है। सत्ता में बैठे लोग यदि टीयर गैस, बैरीकेड्स और गोदी मीडिया के दम पर इस आवाज को दबाने का मुगालता पाले हुए हैं, तो वे ज़मीन की हकीकत से कट चुके हैं।

वहीं, विपक्ष को यह समझना होगा कि युवा अब किसी का बंधुआ वोट बैंक नहीं हैं। यदि राजनीतिक दल अपनी सुस्ती, भ्रम और स्वार्थ को छोड़कर इस स्वतःस्फूर्त आंदोलन को दिशा देने में असफल रहते हैं, तो यह इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता मानी जाएगी। जंतर-मंतर ने साफ संदेश दे दिया है—युवा जाग चुका है, और अब हिसाब होकर रहेगा।

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