लाठी किसके हाथ में थी? लोकतंत्र में सबसे खतरनाक सवाल यही है

लोकतंत्र में पुलिस की लाठी भी कानून से चलती है। उस पर संविधान का नियंत्रण होता है। उसकी जवाबदेही न्यायपालिका और जनता दोनों के प्रति होती है। लेकिन यदि किसी प्रदर्शन के दौरान वर्दी के बिना लोग पुलिस के साथ दिखाई दें, उनके हाथों में डंडे हों और वे भीड़ के बीच सक्रिय नज़र आएँ, तो प्रश्न केवल उनकी पहचान का नहीं रह जाता; प्रश्न पूरे Rule of लॉ का हो जाता है। देश जानना चाहता है— “वे लोग कौन थे?”

* क्या वे दिल्ली पुलिस के सादे कपड़ों में तैनात अधिकारी थे?
* यदि हाँ, तो उनकी पहचान सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
* यदि नहीं, तो कानून-व्यवस्था की कार्रवाई में उन्हें शामिल करने का अधिकार किसने दिया?
भारत का संविधान किसी निजी नागरिक को राज्य की पुलिस शक्ति (Police Power) नहीं देता। लाठी चलाने का अधिकार भी केवल विधि द्वारा अधिकृत अधिकारी को ही है। यदि यह सीमा धुंधली होने लगे, तो लोकतंत्र और भीड़तंत्र के बीच का अंतर भी धुंधला होने लगता है।
* आज प्रश्न किसी एक आंदोलन का नहीं है।
* कल यही प्रश्न किसी किसान आंदोलन में उठेगा।
* किसी छात्र आंदोलन में उठेगा।
* किसी मजदूर रैली में उठेगा।
और शायद किसी पत्रकार के साथ भी उठे। इसलिए यह किसी दल का नहीं, “लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता” का प्रश्न है। सबसे अधिक आश्चर्य इस बात का है कि इस मुद्दे पर खोजी पत्रकारिता लगभग अनुपस्थित दिखाई देती है।
देश के क्राइम रिपोर्टर कहाँ हैं? जिन्होंने वर्षों तक एनकाउंटर, माफिया, पुलिस सुधार और अपराध तंत्र पर रिपोर्टिंग की, क्या उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि पुलिस के साथ चल रहे सादे कपड़ों वाले लोग कौन थे?
* क्या किसी ने RTI दायर की?
* क्या किसी ने पुलिस आयुक्त से पूछा?
* क्या किसी ने गृह मंत्रालय से जवाब माँगा?
* क्या किसी चैनल ने उन चेहरों की पहचान करने का प्रयास किया?
यदि नहीं, तो पत्रकारिता का दायित्व कौन निभाएगा? लोकतंत्र में प्रेस केवल घटनाओं की रिकॉर्डिंग के लिए नहीं होती। वह सत्ता से प्रश्न पूछने के लिए होती है। यदि मीडिया भी यह प्रश्न नहीं पूछेगा कि “लाठी किसके हाथ में थी?”, तो फिर लोकतंत्र की चौथी शक्ति होने का दावा खोखला प्रतीत होगा।
यह प्रश्न किसी सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में किसी भी सरकार के लिए एक स्पष्ट लोकतांत्रिक मानक स्थापित करने के लिए पूछा जाना चाहिए। लोकतंत्र में पुलिस की वर्दी केवल कपड़ा नहीं होती। वह उत्तरदायित्व की पहचान होती है।
वर्दी बताती है कि बल प्रयोग करने वाला कौन है, उसके खिलाफ शिकायत कहाँ होगी, और कानून के तहत उसकी जवाबदेही कैसे तय होगी। यदि वर्दी गायब हो जाए, तो जवाबदेही भी धुंधली हो जाती है। और जब जवाबदेही धुंधली हो जाए, तो नागरिक स्वतंत्रता सबसे पहले घायल होती है।
मोदी सरकार से पाँच सीधे प्रश्न
1. क्या सादे कपड़ों में मौजूद लोग दिल्ली पुलिस के अधिकृत कर्मी थे?
2. यदि हाँ, तो उनकी तैनाती का आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?
3. यदि नहीं, तो उन्हें पुलिस कार्रवाई के बीच लाठी लेकर रहने की अनुमति किसने दी?
4. क्या इस पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र न्यायिक या मजिस्ट्रियल जाँच होगी?
5. क्या संसद और जनता को इस संबंध में आधिकारिक जवाब दिया जाएगा?
लोकतंत्र में सबसे बड़ा संकट तब नहीं आता जब लाठी चलती है। सबसे बड़ा संकट तब आता है जब “यह पता ही न चले कि लाठी चलाने वाला कौन था।”
“लोकतंत्र में लाठी से बड़ा प्रश्न लाठी की पहचान है; क्योंकि जहाँ लाठी अनाम हो जाती है, वहाँ कानून भी बेनाम होने लगता है।”



