चित्तौरगढ़

मेवाड़ के ‘ग्रीन गोल्ड’ सीताफल से किसान हुए मालामाल, कॉस्मेटिक और आयुर्वेद में बढ़ती मांग, 11 जिलों तक फैली मिठास

चित्तौड़गढ़। मेवाड़ की धरती पर सीताफल की मिठास ने न केवल किसानों के चेहरों पर खुशी लाई है, बल्कि यह फल अब कॉस्मेटिक और आयुर्वेदिक उत्पादों में भी अपनी खास जगह बना रहा है। चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेड़ा रोड पर स्थित प्रदेश का एकमात्र सीताफल उत्कृष्टता केन्द्र, नवाचार और गुणवत्ता का प्रतीक बन चुका है। यहां तैयार हो रहे उन्नत किस्म के ग्राफ्टेड सीताफल पौधों ने पूरे प्रदेश में किसानों की जिंदगी संवार दी है।

इस केंद्र की स्थापना के बाद से पिछले छह वर्षों में करीब 21 हजार 707 पौधे केवल चित्तौड़गढ़ से ही नहीं, बल्कि राजस्थान के 11 जिलों और मध्यप्रदेश के हिस्सों में भी भेजे जा चुके हैं। ये पौधे परंपरागत सीताफल की तुलना में ज्यादा गुणकारी और मीठे हैं, जिससे मांग लगातार बढ़ रही है।

सीताफल फल की मधुरता और पौष्टिकता का लाभ अब स्थानीय सीमाओं से बाहर जाकर भी देखा जा रहा है। मेवाड़ की इस उपज ने न केवल किसानों की आय बढ़ाई है, बल्कि आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों और कॉस्मेटिक इंडस्ट्री के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण कच्चा माल बन गया है। इससे जुड़े नवाचारों और उन्नत किस्मों के विकास ने इसे क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि की नई दिशा दी है।

किसानों का कहना है कि पिछले वर्षों में इस फल की खेती से उनकी आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सीताफल की खेती न केवल कम लागत वाली और पर्यावरण अनुकूल है, बल्कि इसके फल स्थानीय बाजारों के साथ-साथ दूर-दराज के क्षेत्रों में भी तेजी से बिक रहे हैं। इसी के चलते अनेक किसान इस फल की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

राज्य सरकार और कृषि विभाग भी इस पहल को प्रोत्साहित कर रहे हैं। नवीन किस्म के पौधों के वितरण के साथ-साथ सीताफल की आधुनिक खेती पर प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। इससे किसानों को बेहतर तकनीक और उत्पादन के नए तरीकों से अवगत कराया जा रहा है, ताकि उत्पादन क्षमता में सुधार हो सके और वे अधिक लाभ कमा सकें।

चित्तौड़गढ़ में इस केंद्र के माध्यम से किये जा रहे अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रम फलस्वरूप यहां की मिट्टी और जलवायु के हिसाब से सर्वश्रेष्ठ किस्म के पौधे विकसित करने में सफल रहे हैं। इससे क्षेत्रीय किसानों को अपनी उपज बढ़ाने का अवसर मिला है।

इस तरह, मेवाड़ का सीताफल अब केवल एक स्थानीय फल नहीं रह गया है, बल्कि यह ‘ग्रीन गोल्ड’ के रूप में उभर चुका है, जो किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है और प्रदेश की कृषि विविधता का गौरव बढ़ा रहा है। यह मिठास अब रेगिस्तान से लेकर मालवा तक फैली है, जो मेवाड़ की उस धरा की जीवंतता का परिचायक है जिसने कभी तलवारों की खनक सुनी थी।

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