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ई-20, माइलेज और भरोसे का संकट

"जब ईंधन की बचत, उपभोक्ता की जेब और सरकार का दावा एक-दूसरे से टकराने लगें"

भारत को अगर सचमुच ऊर्जा-संक्रमण के रास्ते पर आगे बढ़ना है, तो यह काम नारेबाज़ी से नहीं, पारदर्शिता, तकनीकी ईमानदारी और उपभोक्ता-हित की रक्षा से होगा। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण का कार्यक्रम इसी बड़े लक्ष्य के नाम पर आगे बढ़ाया गया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 10 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य जून 2022 में पूरा हुआ और 20 प्रतिशत मिश्रण यानी ई-20 का लक्ष्य 2025 में हासिल कर लिया गया। सरकार यह भी कहती है कि इस कार्यक्रम से विदेशी मुद्रा बची, किसानों की आय बढ़ी और कार्बन उत्सर्जन कम हुआ।

लेकिन समस्या यहीं शुरू होती है। जब नीति का बोझ जनता उठाए और लाभ का पूरा लेखा-जोखा सरकार अपने खाते में लिखे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। सरकार के अपने आधिकारिक नोट में माना गया है कि E10 के लिए डिज़ाइन और E20 के लिए कैलिब्रेट न की गई चार-पहिया गाड़ियों में ईंधन दक्षता में “मामूली” कमी हो सकती है। उसी दस्तावेज़ में यह भी कहा गया है कि वाहन-निर्माताओं, SIAM, ARAI और IOCL के परीक्षणों के बाद ही E20 को मंजूरी दी गई। यानी सरकार एक साथ दो बातें कह रही है: कार्यक्रम वैज्ञानिक रूप से सत्यापित है, और फिर भी कुछ वाहनों में माइलेज घट सकता है। यही दोहरा संदेश आज उपभोक्ता के संदेह का कारण बन गया है।

सवाल यह नहीं है कि इथेनॉल मिलाया जाए या नहीं। सवाल यह है कि क्या जनता को पूरी सच्चाई साफ़-साफ़ बताई गई? क्या पुरानी और नई गाड़ियों के बीच फर्क स्पष्ट किया गया? क्या उपभोक्ता को बताया गया कि उसकी कार किस ईंधन के लिए बनी थी, किस ईंधन पर कैसी चलेगी, और किस कीमत पर चलेगी? जब नीति की भाषा “ग्रीन ट्रांज़िशन” की होती है लेकिन अनुभव माइलेज गिरने का होता है, तब भरोसा टूटता है। और जब भरोसा टूटता है, तब तकनीक नहीं, शासन पर प्रश्न खड़े होते हैं।

सरकार का तर्क है कि इथेनॉल से प्रदूषण घटेगा और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम होगी। यह तर्क अपने-आप में गलत नहीं है। आधिकारिक विवरण के अनुसार 2014-15 से अब तक इस कार्यक्रम से विदेशी मुद्रा की बचत, CO₂ कटौती और किसानों को अतिरिक्त भुगतान के दावे किए गए हैं। मंत्रालय यह भी कहता है कि गन्ना और मक्का आधारित इथेनॉल के जीवन-चक्र उत्सर्जन पेट्रोल से कम हैं।

लेकिन विकास की कोई भी नीति तब तक नैतिक नहीं मानी जा सकती, जब तक वह उपभोक्ता को विकल्प, जानकारी और सुरक्षा न दे। यदि ई-20 को भविष्य का ईंधन बताया जा रहा है, तो इसके साथ यह भी बताना होगा कि कौन-सी कारें इसकी अनुकूल हैं, कौन-सी नहीं, पुराने वाहनों का व्यावहारिक क्या होगा, और जिनकी गाड़ियों ने समय से पहले हार मान ली, उनका मुआवज़ा या उपचार क्या है। “मिल जाएगा”, “चल जाएगा”, “मामूली असर है” जैसी प्रशासनिक भाषा आम आदमी की खर्चीली हकीकत को नहीं ढक सकती। जब एक परिवार हर महीने ईंधन, सर्विस, EMI और बीमा के बीच पिस रहा हो, तब “मामूली” शब्द बहुत बड़ा मज़ाक बन जाता है।

यही इस विवाद का असली केंद्र है। ईंधन सिर्फ़ पेट्रोल पंप का मामला नहीं है। यह रोज़गार, परिवहन, खेती, बाजार, उपभोक्ता-सुरक्षा और उद्योग-विश्वास का प्रश्न है। यदि वाहन-निर्माता अलग बात कहें, मंत्रालय अलग बात कहे, और उपभोक्ता अपने अनुभव से कुछ और महसूस करे, तो यह केवल तकनीकी मतभेद नहीं रहता। यह सूचना-प्रबंधन का संकट बन जाता है। और सूचना-प्रबंधन का संकट अंततः विश्वास-प्रबंधन का संकट होता है।

सबसे खतरनाक स्थिति तब बनती है जब नीति-निर्माता आलोचना को “विरोध” और उपभोक्ता की शिकायत को “अज्ञान” घोषित करने लगें। जिन नागरिकों ने अपनी गाड़ी, अपनी बचत और अपने भरोसे के साथ यह ईंधन अपनाया, वे प्रचार के पात्र नहीं, जवाब के हकदार हैं। यदि सरकार को लगता है कि E20 एक वैज्ञानिक और देशहितैषी कदम है, तो उसे खुले, सरल और तुलनात्मक आंकड़ों के साथ जनता को समझाना चाहिए। केवल प्रेस नोट जारी कर देने से गाड़ी नहीं चलती; नीति का भरोसा भी नहीं बनता।

इसलिए अब समय है कि सरकार रक्षात्मक मुद्रा छोड़कर स्पष्टता की मुद्रा अपनाए। E20 की वास्तविक लागत, वास्तविक लाभ, वास्तविक जोखिम और वास्तविक विकल्प—सब कुछ साफ़-साफ़ रखा जाए। उपभोक्ता को यह अधिकार है कि वह जाने कि उसके टैंक में क्या जा रहा है, उसकी जेब से क्या निकल रहा है, और बदले में उसे क्या मिल रहा है। विकास का अर्थ जनता से परीक्षा लेना नहीं, जनता को जानकारी देकर साथ लेकर चलना है। अगर नीति जनता के अनुभव से बार-बार टकराएगी, तो सवाल उठेगा ही: क्या हम सचमुच नए भारत की ओर बढ़ रहे हैं, या सिर्फ़ नए नामों के साथ पुरानी गैर-जवाबदेही दोहरा रहे हैं?

“जब ईंधन की बचत का हिसाब उपभोक्ता की जेब से और सरकार का लाभ खजाने से लिखा जाए, तो भरोसे का माइलेज सबसे पहले गिरता है।”

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