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जवाबदेही से पलायन और संवाद की गिरती संस्कृति

“भारतीय लोकतंत्र की नींव” शासकों की जनता के प्रति अटूट जवाबदेही और विमर्श की शालीनता पर टिकी है। परंतु, हाल के वर्षों में केंद्र से लेकर विभिन्न राज्यों की सत्ताओं में एक नया और चिंताजनक राजनीतिक चरित्र उभर रहा है—’सामूहिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना और हर आलोचना को राष्ट्रविरोधी या व्यक्तिगत हमला करार देना।’ जब नीतियां विफल होती हैं या व्यवस्थागत खामियां उजागर होती हैं, तब शीर्ष नेतृत्व द्वारा जिम्मेदारी लेने के बजाय शुतुरमुर्गी रवैया अपनाना या देशभक्ति की आड़ में जनता से ही निरंतर त्याग की अपेक्षा करना, एक परिपक्व लोकतंत्र के लक्षण नहीं हैं।

विगत एक दशक के इतिहास पर नजर डालें तो नोटबंदी की कतारें हों, लॉकडाउन का मानवीय संकट, चीन की सीमा पर कूटनीतिक-सैन्य चुनौतियां, पुलवामा-पहलगाम जैसे आतंकी घाव, या फिर मणिपुर का अनवरत सुलगता जनजातीय संघर्ष—हर मोर्चे पर जनता ने जान-माल की भारी कीमत चुकाई है। हाल ही में राम मंदिर जैसे संवेदनशील और आस्था से जुड़े विषय में वित्तीय विसंगतियों की खबरों ने जनमानस को भावनात्मक रूप से आहत किया है। इसके बावजूद, लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नैतिक जिम्मेदारी लेने या भूल-सुधार की संस्कृति ओझल दिखती है। इसके विपरीत, व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले नागरिक समाज और उमर खालिद जैसे आलोचकों पर कानून का शिकंजा कसने में तनिक भी देर नहीं की जाती। जब विपक्ष या नागरिक मंच इन मुद्दों को उठाते हैं, तो उसे ‘व्यक्तिगत निंदा’ की संज्ञा देकर विमर्श को मुख्य मुद्दों से भटका दिया जाता है।

मर्यादा की दहलीज लांघती राजनीतिक भाषा

दुर्भाग्यवश, केंद्रीय सत्ता की यह शैली अब राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के आचरण में भी संचरित हो रही है। महाराष्ट्र का हालिया घटनाक्रम इसका ज्वलंत प्रमाण है। मानसून की शुरुआती बारिश में ही मुंबई-पुणे मिसिंग लिंक एक्सप्रेसवे जैसी 7,000 करोड़ रुपये की महात्वाकांक्षी परियोजना पर भूस्खलन होना और घंटों यातायात ठप रहना, सीधे तौर पर निर्माण की गुणवत्ता और प्रशासनिक दूरदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

जब इन संरचनात्मक खामियों पर विधानसभा में नियम 293 के तहत बहस हुई, तो उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तकनीकी कमियों को स्वीकार करने के बजाय तीखा आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने इस परियोजना को ‘वैश्विक इंजीनियरिंग का नमूना’ बताते हुए आलोचकों को खारिज कर दिया। यहाँ तक तो राजनीतिक बचाव समझा जा सकता था, परंतु सदन के भीतर उन्होंने सोशल मीडिया पर आलोचना करने वालों के लिए जिन असंसदीय और अमर्यादित शब्दों का प्रयोग किया, उसने संसदीय गरिमा को हाशिए पर धकेल दिया।

“सत्ता का यह अहंकार अत्यंत चिंताजनक है” : जब सदन में सत्तापक्ष ऐसी अमर्यादित भाषा की मेजें थपथपाकर सराहना करता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि लोकतांत्रिक विमर्श में ‘शालीनता और असहमति के सम्मान’ की जगह अब ‘अहंकार और आक्रामकता’ ने ले ली है। जिस सोशल मीडिया और ट्रोल संस्कृति को आज कोसा जा रहा है, उसे राजनीति के इस ऊंचे मुकाम तक पहुंचाने में किसका संरक्षण रहा है, यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है।

इंफ्रास्ट्रक्चर का संकट या संस्थागत भ्रष्टाचार?

यह प्रवृत्ति केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश में जब एक सजग पत्रकार ने मंत्री दिनेश प्रताप सिंह से सवाल किया कि मुख्यमंत्री के उद्घाटन से पहले ही लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे क्यों धंस गया, तो मंत्री महोदय का गैर-जिम्मेदाराना जवाब था—”इसमें कौन सी नई बात है, सड़क खुद बनवा लो।”

सड़कों का समय के साथ टूटना एक सामान्य प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन उद्घाटन से पहले या चालू होने के कुछ ही दिनों के भीतर:

* हवाई अड्डों की छतों का ढहना,
* नए बने रेलवे स्टेशनों पर जलभराव होना,
* और एक्सप्रेसवे का धंसना…

यह सब सामान्य टूट-फूट नहीं, बल्कि “संस्थागत भ्रष्टाचार और बदतर गुणवत्ता नियंत्रण” का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई से बनने वाली ये भारी-भरकम परियोजनाएं यदि पहली ही बारिश नहीं झेल पातीं, तो यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि विकास के बजट का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है। सबसे त्रासद पहलू यह है कि देश की जनता ने भी इस प्रशासनिक कदाचार को नियति मानकर स्वीकार कर लिया है।

आलोचना देशद्रोह नहीं: न्यायपालिका का संदेश

राजनीतिक दल अक्सर यह भूल जाते हैं कि सरकार की आलोचना और देश की आलोचना दो अलग-अलग बातें हैं। हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस माधव जामदार ने सरकार विरोधी नारे लगाने वाले एक व्यक्ति के तड़ीपार आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि नेताओं के खिलाफ नारेबाजी करना देशविरोधी कृत्य नहीं है। इससे पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी रेखांकित किया था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

यह सत्य है कि आज बनाई जा रही परियोजनाओं के शिलालेखों पर वर्तमान शासकों के नाम दशकों तक रहेंगे, ठीक वैसे ही जैसे आज भी देश कांग्रेस के शासनकाल में बने नेहरूवियन इंफ्रास्ट्रक्चर को देख रहा है। सरकार किसी भी दल की हो, वह जनता के दिए जनादेश और धन से ही काम करती है। जन-कल्याण और बुनियादी ढांचे का निर्माण करना सरकार का बुनियादी कर्तव्य है, जनता पर कोई अहसान नहीं।

“शिलालेखों पर नाम लिखवाने की जिद में सरकारें यह भूल गईं कि लोकतंत्र में जनसरोकारों का धंसना, सड़कों के धंसने से कहीं अधिक आत्मघाती है।”

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