चित्तौरगढ़

सांवल्या सेठ मंदिर में 56 भोग लगाने और मोरपंख चढ़ाने पर रोक, श्रद्धालुओं के लिए नई व्यवस्था शुरू

चित्तौड़गढ़। मंडफिया क्षेत्र में स्थित सांवलिया सेठ मंदिर में दर्शन व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जो भक्तों के लिए एक नई व्यवस्था का परिचायक होंगे। लंबे समय से चली आ रही 56 भोग लगाने की परंपरा और भगवान को मोरपंख चढ़ाने की प्रथा अब समाप्त कर दी गई है। यह निर्णय मंदिर प्रशासन ने मंदिर की स्वच्छता, भक्तों की सुविधा और व्यवस्थित प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए लिया है।

सांवल्या सेठ मंदिर को चित्तौड़गढ़ में आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है और यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मंदिर में भोग और पुष्पांजलि की परंपराएं वर्षों से चली आ रही थीं, जिनमें सबसे प्रमुख 56 भोग लगाने की परंपरा थी। इसके तहत भगवान के विभिन्न रूपों को 56 प्रकार के विभिन्न भोग चढ़ाए जाते थे, जो श्रद्धालुओं के बीच विशेष श्रद्धा का विषय था। वहीं मोरपंख चढ़ाना भी एक ऐसा ritual था जिसे विशेष महत्व दिया जाता था।

मंदिर प्रशासन के सूत्रों ने बताया कि इन प्रथाओं को बंद करने के पीछे मकसद मंदिर परिसर की स्वच्छता को बनाए रखना और दर्शन का अनुभव और बेहतर बनाना है। पहले भोग लगाने के कारण मंदिर परिसर में कई जगह गंदगी फैलती थी, जिससे भक्तों को असुविधा होती थी। वहीं मोरपंख के प्रयोग से भी परिसर में धूल और अन्य उचित सफाई की समस्या पैदा हो रही थी।

अधिकारियों ने कहा कि भले ही 56 भोग और मोरपंख चढ़ाने की परंपरा बंद की गई है, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए अन्य प्रकार की पूजा सुविधाएं और आध्यात्मिक गतिविधियां बढ़ाई जाएंगी। मंदिर समिति ने यह भी आश्वासन दिया कि मंदिर परिसर में सुविधाजनक और सुव्यवस्थित व्यवस्था के लिए नए प्रबंध किए गए हैं, जिससे भक्तों को सरल और सहज दर्शन का अवसर मिलेगा।

इस फैसले के बाद मंदिर प्रशासन ने सभी श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे नए नियमों का पालन करें और मंदिर परिसर की शांति एवं साफ-सफाई बनाए रखने में सहयोग करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्णय भक्तों की सुविधा और मंदिर की दीर्घकालिक देखभाल के लिए लिया गया है।

मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए यह नया प्रबंधन प्रणाली अधिक कारगर साबित हो सकती है। भक्तगण अब कम भीड़ और बेहतर अनुभव के साथ भगवान के दर्शन कर पाएंगे। सांवलिया सेठ मंदिर की यह पहल अन्य धार्मिक स्थलों के लिए भी एक उदाहरण बन सकती है, जहां आधुनिक आवश्यकताओं और धार्मिक रूढ़ियों के बीच संतुलन स्थापित किया जा रहा है।

Source

Related Articles

Back to top button