विश्व कला दिवस: तीन पीढ़ियों की मेहनत से बहरूपिया कला का जीवंत प्रदर्शन

चित्तौड़गढ़। डिजिटल युग में जहां मनोरंजन के नए-नए साधन विकसित हो रहे हैं, वहीं प्राचीन कलाओं को जिंदा रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में चित्तौड़गढ़ जिले के एक परिवार ने बहरूपिया कला को संजोया हुआ है। यह परिवार दादा, पिता और पौत्र की तीन पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करता है, जो आज भी मंच पर अपनी कला के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करते हैं और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखे हुए हैं।
बहरूपिया कला, जो पारंपरिक रूप से भेष बदलकर अभिनय करने की कला है, राजस्थान की लोक कला में विशेष स्थान रखती है। इस कला में कलाकार अकेले ही कई विभिन्न पात्रों का अभिनय कर दर्शकों का ध्यान आकर्षित करते हैं। चित्तौड़गढ़ के इस परिवार ने वर्षों से इस कला को ना केवल सीखा बल्कि इसे नयी पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयत्न किया है।
परिवार के बुजुर्ग दादा कहते हैं, “इस डिजिटल दौर में लोगों का मनोरंजन का तरीका बदल गया है, लेकिन हमारी बहरूपिया कला से जुड़ी भावनाएं अभी भी मिट नहीं पाईं हैं। हमने हमेशा कोशिश की है कि यह कला विरासत बनकर बनी रहे।” पिता जी भी इस बात को सहमति देते हैं और बताते हैं कि कैसे वे अपने बेटे को इस कला की बारीकियां सिखा रहे हैं। पौत्र भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित नजर आता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इसी तरह के कलाकारों की वजह से हमारी संस्कृति और लोक कला बनी रहती है। मंचों पर तीन पीढ़ियों का एक साथ प्रस्तुत होना इस बात का प्रमाण है कि यदि इच्छा हो तो कोई भी कला समय की कसौटी पर खरी उतर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बहरूपिया कला को डिजिटल मीडिया की मदद से नया रूप दिया जा सकता है जिससे युवा वर्ग भी इससे जुड़ सके। इसके लिए सामुदायिक प्रयास और सरकारी स्तर पर समर्थन जरूरी है, ताकि यह अमूल्य धरोहर काल के पन्नों में कहीं खो न जाए।
इस परिवार ने साबित किया है कि सांस्कृतिक कलाओं को जिंदा रखना केवल कलाकारों की मेहनत का परिणाम नहीं बल्कि समाज की समझ और सराहना का भी प्रतिबिंब है। आने वाले दिनों में इस प्रकार की कलाओं को संरक्षित करने के लिए हम सबको मिलकर कदम बढ़ाने होंगे।




