चित्तौरगढ़

अमृत काल में ‘झोले’ वाला स्टेशन: न सिग्नल, न प्लेटफॉर्म…वंदे भारत के दौर में आज भी बिकते हैं मुहर लगे कागज के छोटे टिकट

भीलवाड़ा: भारतीय रेलवे आज वंदे भारत की ग्लैमरस यात्रा और अमृत भारत स्टेशनों के भव्य स्वरूप का जश्न मना रहा है। देश की प्रमुख रेलवे लाइनों पर तेज़ गति से दौड़ती ट्रेनें आधुनिक इंजीनियरिंग और सुविधा का परिचय दे रही हैं। परंतु, चित्तौड़गढ़ जिले के पास नेतावल गांव की पटरियों पर यह तेज़-तर्रार तस्वीर कहीं खो जाती है। विकास की चमक यहाँ फीकी नजर आती है।

नेतावल रेलवे स्टेशन की स्थिति अत्यंत साधारण और पिछड़ी है। यहाँ न तो कोई संकेतक बोर्ड है, न प्लेटफॉर्म का स्वरूप ठीक से बना हुआ है। स्टेशन पर आने-जाने वाले यात्रियों के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव साफ नजर आता है। टिकटिंग व्यवस्था भी एक अनोखी छवि लिए है। जहां देशभर के रेलवे स्टेशनों पर डिजिटल टिकटिंग और स्मार्ट कार्ड का दौर चल रहा है, वहीं नेतावल में आज भी पुराने जमाने की मुहर लगे कागज के छोटे टिकट बिकते हैं। यह दृश्य भारतीय रेलवे की आधुनिकता के तजबजे में अप्रत्याशित रूप से पिछड़ा प्रतीत होता है।

स्थानीय लोग बताते हैं कि नेतावल रेलवे स्टेशन पर दिन भर यात्रियों का आना-जाना काफी कम होता है। इसलिए अधिक संसाधन और सुविधाएं लगाना रेलवे के लिए प्राथमिकता में नहीं आता। परंतु, इससे क्षेत्र के यात्रियों को असुविधा होती है। वे शिकायत करते हैं कि न तो प्लेटफॉर्म की स्थिति अच्छी है और न ही यात्रियों के लिए छाया या बैठने की कोई व्यवस्था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सिग्नल व्यवस्था न होने से ट्रेन आने-जाने में दिक्क़तें आती हैं, जो सुरक्षा के लिहाज से भी चिंता का विषय है।

भारतीय रेलवे की आधिकारिक रिपोर्टों में नेतावल जैसी कई छोटी और ग्रामीण इकाइयों की स्थिति चिंताजनक बताई गई है। इन स्थानों पर विकास योजनाओं और निवेश की कमी बनी हुई है। जबकि वंदे भारत जैसी सुपरफास्ट ट्रेनों और अमृत भारत स्टेशनों की चमक-दमक से एकदम विपरीत तस्वीर यह है।

रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे स्टेशन भी यात्रियों की सेवा का अहम हिस्सा हैं। इन्हें नजरअंदाज करने से ग्रामीण इलाकों के विकास में बाधा आती है। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर स्टेशन पर न्यूनतम सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं, ताकि यात्रियों को सुरक्षा और सुविधा दोनों मिल सकें। कागज पर बने टिकटों की जगह डिजिटलीकरण को बढ़ावा देना भी आवश्यक है।

नेतावल की इस स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि भारत में रेलवे के बिच्छिन स्तरों पर अभी भी काफी काम शेष है, जिससे ‘अमृत काल’ की संपूर्ण कल्पना साकार हो सके। वहीं वंदे भारत और अमृत रेलवे स्टेशनों की चमक-धमक देश के रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर की उत्कृष्टता का उदाहरण बनती रहती है।

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