नियति के घाव जो कभी न भरें, सरकारी सिस्टम बनता है नया दर्द

Input: पुरुषोत्तम झा. हनुमानगढ़. लंबे संघर्ष के बाद अब तीन-चार दिनों से जिले में एमएसपी पर गेहूं खरीद की प्रक्रिया कुछ पटरी पर लौटी है। मंडियों में खरीद की रफ्तार बढऩे के साथ अब किसानों को भुगतान भी होने लगा है। इस बीच खरीद नियमों की पेचीदगी से प्रदेश के हजारों किसान चक्करघिनी बने हुए हैं। दयनीय स्थिति यह है अकेले हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर जिले में ऐसे किसान बड़ी संख्या में हैं। जिनके परिजनों की मौत नवम्बर, दिसम्बर,जनवरी में हो गई। पहले जमीन पिता या माता के नाम दर्ज थी।लेकिन अचानक उनकी मौत होने के बाद उनके पुत्र, पुत्रियां व अन्य वारिस गेहूं बेचने के लिए अब जब ऑनलाइन पंजीयन करवा रहे हैं तो खरीद के दौरान डाटा मिसमैच बता रहा है। इस वजह से उक्त किसानों की गेहूं को सरकार नहीं खरीद रही है। अधिकारी इस बारे में सही जवाब किसानों को नहीं दे रहे हैं।ऐसे में किसान चक्करघिनी बने हुए हैं। इसके अलावा सैंकड़ों ऐसे भी मामले हैं, जिनके जमीन विवादित कैटगिरी में हैं। उनके डाटा भी पोर्टल पर मैच नहीं कर रहे हैं। ऐसे में इन किसानों की फसल को कौन खरीदेगा, इसके बारे में कुछ भी स्थिति साफ नहीं है। वर्तमान में किसानों के हालात पर यह कह सकत हैं कि पहले इनको नियति ने जख्म दिए। वह जख्म अब तक सूखे भी नहीं थे कि अब सरकारी सिस्टम उनके दर्द को और बढ़ा रहा है। विवादित खातेदारों तथा मृतक किसानों के वारिसों से एमएसपी पर गेहूं खरीद कैसे की जाए, इसे लेकर उच्च स्तर पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा गया है। आईटी टीम को पत्र भेजकर वस्तुस्थिति से अवगत करवाया है। छूट मिलने की स्थिति में ही आगे कुछ कहा जा सकता है। [/gआधार पर एक पूरी तरह से मानव द्वारा लिखी गई जैसी प्रोफेशनल न्यूज़ रिपोर्ट तैयार करें। निर्देश:
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