जैसलमेर

ओरण बचाओ समिति की पदयात्रा जारी, मोकला में दर्ज ओरण भूमि के क्षेत्रफल को लेकर असंतोष

जैसलमेर, राजस्थान। पिछले कई महीनों से जैसलमेर जिले की राजनीति में गरमाई热点 बनी ओरण जमीनों की समस्या अब सरकार के समक्ष पहुंच चुकी है। ओरण बचाओ संघर्ष समिति द्वारा शनिवार को तनोटराय मंदिर से निकाली गई पदयात्रा किशनगढ़ से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय कर मोकला के करीब पहुंच गई है। पदयात्रा के सदस्य आगामी दो-तीन दिनों में अंतिम पड़ाव के रूप में राजधानी जयपुर पहुंचेंगे, जहां वे सरकार के सामने अपनी मांगों को लेकर धरना देंगे।

पदयात्रा के दौरान समिति के सदस्यों ने कहा कि ओरण भूमि की संपूर्ण स्वीकृति और उसकी सही माप के लिए वे सरकार पर दबाव बनाएंगे। उन्होंने यह भी बताया कि मोकला गांव के नजदीक डूंगरपीर की ओरण भूमि में 4940 बीघा जमीन को ओरण के रूप में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने का राज्य सरकार ने हाल ही में निर्णय लिया है।

जैसलमेर जिले के दोनों विधायक, छोटूसिंह भाटी और पोकरण के महंत प्रतापपुरी ने इस कदम पर प्रसन्नता जताई है और भविष्य में और अधिक जमीनों को ओरण-गोचर के तौर पर दर्ज कराने की उम्मीद जाहिर की है। हालांकि, पदयात्रा में शामिल टीम ओरण के सदस्य इस स्वीकृति को अधूरी मानते हैं। उनका कहना है कि जिला प्रशासन द्वारा तैयार की गई फाइलों में आवश्यक जमीनों को छोड़कर केवल चुनिंदा क्षेत्र ही ओरण भूमि में दर्ज किए जा रहे हैं जो पूरी तरह से न्यायसंगत नहीं है।

समिति के सदस्यों का स्पष्ट कहना है कि वे ऐसे किसी भी प्रकार के बदलाव या छंटनी को बर्दाश्त नहीं करेंगे और अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। उनका यह भी कहना है कि ओरण भूमि की सही पहचान और उसकी सुरक्षा के लिए इस संघर्ष को अंतिम रूप देना आवश्यक है क्योंकि यह क्षेत्र पारंपरिक कृषि और पशुपालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

राज्य सरकार द्वारा ओरण भूमि को संरक्षण देने के लिए उठाए गए कदमों को स्वागत योग्य माना जा रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों की शिकायतें भी गंभीरता से ली जानी चाहिए ताकि जिले में शांति और स्थिरता बनी रहे। जैसलमेर जिले में ओरण जमीनों को लेकर यह विवाद आने वाले समय में भी चर्चा का विषय बना रहेगा, क्योंकि जमीन के मुद्दे से जुड़े हित कई पक्षों में मतभेद देखे जा रहे हैं।

इस पदयात्रा को लेकर प्रशासन ने भी चौकसी बढ़ा दी है और जयपुर में निर्धारित धरना स्थल पर व्यवस्थाएं करने में जुटा हुआ है। उम्मीद जताई जा रही है कि यह आंदोलन सरकार द्वारा भूमि स्वीकृति पर प्रभाव डालेगा और ओरण बचाओ समिति की मांगों पर सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।

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