हाईकोर्ट का आदेश: आवारा कुत्तों को पकड़ने में बाधा डालने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो

श्रीगंगानगर, राजस्थान। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर सख्त निर्देश जारी किए हैं। न्यायालय ने नगर परिषद को आदेश दिया है कि शहर के विभिन्न इलाकों से आवारा कुत्तों और अन्य जानवरों को पकड़कर हटाने के लिए तत्काल प्रभाव से उचित कार्रवाई की जाए। यह कदम नगर निगम के कर्मचारियों की कार्यवाही में बाधा डालने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया है।
यह आदेश जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने भागवंती देवी बनाम राज्य सरकार व अन्य याचिका की सुनवाई के दौरान दिया। सुनवाई में राज्य सरकार के अधिवक्ता ने बताया कि जब भी नगर परिषद के कर्मचारी आवारा कुत्तों को पकड़ने का प्रयास करते हैं, तो कई बार स्थानीय निवासी हस्तक्षेप करते हैं और कार्रवाई में रुकावट उत्पन्न करते हैं। इस मुद्दे पर ईमानदारी से सुनवाई करते हुए, कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि नगर निगम के कर्मचारी अपने कर्तव्यों का गंभीरता से पालन करेंगे और किसी भी प्रकार की रूकावट सहन नहीं करेंगे।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी स्थानीय निवासी या व्यक्ति द्वारा आवारा कुत्तों को पकड़ने वाले कर्मचारियों के काम में बाधा डाली जाती है, तो संबंधित कर्मचारियों को तुरंत एफआईआर दर्ज करवाने और उचित कानूनी कार्रवाई करने की स्वतंत्रता होगी। इससे न केवल कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि आवारा पशुओं द्वारा उत्पन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी समस्याओं का त्वरित समाधान भी होगा।
इस आदेश के बाद नगर परिषद को भी दो सप्ताह के भीतर मामले में विस्तृत जवाब देने का निर्देश दिया गया है, तथा मामले की पुनः सुनवाई चार सप्ताह बाद सुनिश्चित की गई है। यह कदम शहर में आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रित करने और जनता को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आवारा कुत्तों की समस्या न केवल शहरी सफाई में बाधा डालती है, बल्कि इससे जानलेवा हादसों का खतरा भी बढ़ता है। हाईकोर्ट के इस आदेश से उम्मीद की जा रही है कि आवारा जानवरों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएंगे और स्थानीय प्रशासन अधिक सजग होकर इस समस्या से लड़ने में सक्षम होगा।
राजस्थान के कई नगर निगमों को इस दिशा में पहले भी कई बार निर्देश दिए गए हैं, लेकिन हर बार स्थानीय लोगों की भूमिका इस कार्य में बाधा बनती आई है। अब न्यायालय के आदेश से यह स्पष्ट होगा कि महामारी जैसे हालात में भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा सर्वोपरि होगी और कानून को भी कठोरता से लागू किया जाएगा।
इस न्यायिक कदम से यह संदेश भी जाता है कि प्रशासनिक संस्थान अपने दायित्वों से पीछे नहीं हटेंगे और विनाशकारी परिणामों को रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई पूरी पारदर्शिता और कठोरता के साथ करेंगे। भविष्य में नागरिकों को भी इस दिशा में अधिकारिक आदेशों का सम्मान करना आवश्यक होगा जिससे सामूहिक रूप से शहर की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।




