चित्तौड़गढ़: खेतों में खिली पीली सुनहरी चमक; सरसों-गेहूं से आगे निकली सूरजमुखी, किसानों की बदल रही किस्मत

चित्तौड़गढ़, राजस्थान। राजस्थान के कई जिलों में पारंपरिक खेती के तौर-तरीकों में बदलाव आता दिख रहा है। खासतौर पर सूरजमुखी की खेती किसानों के बीच एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। कम पानी और कम लागत में ज्यादा मुनाफा देने वाली यह फसल अब किसानों के लिए ‘एटीएम’ साबित हो रही है। चित्तौड़गढ़ जिले के बड़ी सादड़ी उपखंड के ओरवड़िया गांव में यह प्रयोग विशेष रूप से सफल हो रहा है।
कट्स मानव विकास केंद्र और हैदराबाद के तिलहन संस्थान के सहयोग से शुरू हुआ यह कृषि नवाचार अब जिले के 39 अन्य खेतों में अपनाया जा रहा है। किसान पारंपरिक सरसों और गेहूं की खेती से आगे बढ़कर सूरजमुखी की खेती करने लगे हैं। इस बदलाव के पीछे मुख्य कारण सूरजमुखी की कम जल आवश्यकता और बढ़िया लागत लाभ है।
औसतन, सूरजमुखी की खेती में पारंपरिक फसलों की तुलना में 30-40 प्रतिशत कम पानी की जरूरत पड़ती है। इसके साथ ही उत्पादन लागत भी काफी कम होती है। किसान आनंद सिंह बताते हैं कि उन्होंने अपनी तीन एकड़ जमीन पर सूरजमुखी की खेती की, जिसे देखकर आस-पास के कई किसान भी प्रभावित हुए और इस दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
सूरजमुखी की फसल में बीज से लेकर कटाई तक का पूरा तकनीकी ज्ञान कट्स मानव विकास केंद्र द्वारा किसानों को दिया जाता है। इससे किसानों को आधुनिक तकनीक से खेती करने में मदद मिल रही है और वे बेहतर उपज और लाभ प्राप्त कर पा रहे हैं।
प्रतापगढ़ जिले में भी सूरजमुखी की खेती को लेकर किसानों में उत्साह देखा जा रहा है। कम लागत, जल संरक्षण और बढ़िया आय इसे एक संभावित फसल के रूप में स्थापित कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि राजस्थान जैसे सूखे और अर्ध-शुष्क इलाके में सूरजमुखी जैसी फसलों को बढ़ावा देना किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने का एक महत्वपूर्ण कदम है।
सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान इस पहल को आगे बढ़ाने में जुटे हैं ताकि राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों के किसान बेहतर खेती कर सकें। किसानों का मानना है कि सूरजमुखी की खेती ने उनकी आय का दायरा बढ़ाया है और संकट के समय आर्थिक मदद का स्रोत भी बना है। इस तरह की कृषि नवाचार से राजस्थान के कृषि क्षेत्र में नई क्रांति की उम्मीद जगी है।




