आईआईटी जोधपुर का बड़ा अविष्कार: कचरे से बने ‘बायो-ब्रिक्स’, सस्ते और टिकाऊ घरों का नया रास्ता

जोधपुर, राजस्थान – पराली जलने और प्लास्टिक कचरे के बढ़ते संकट के बीच, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जोधपुर ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। आईआईटी जोधपुर के वैज्ञानिकों ने एक पेटेंटेड तकनीक विकसित की है, जिसके माध्यम से कृषि अवशेष जैसे पराली और प्लास्टिक कचरे को सशक्त और टिकाऊ निर्माण सामग्री में बदला जा सकता है। यह नवाचार न केवल पर्यावरण को प्रदूषण से बचाएगा, बल्कि आवास उद्योग में भी क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है, जो स्वास्थ्य समस्याओं के साथ-साथ पर्यावरणीय नुकसान भी करता है। वहीं, प्लास्टिक कचरे की बढ़ती मात्रा भी संकट बनी हुई है। इन दोनों समस्याओं को देखते हुए आईआईटी जोधपुर ने इन कचरों का पुनः उपयोग करते हुए ‘बायो-ब्रिक्स’ विकसित किए हैं। यह ईंटें पारंपरिक ईंटों की तुलना में अधिक मजबूत तथा टिकाऊ होती हैं और उनका निर्माण पर्यावरण के अनुकूल सामग्री से होता है।
आईआईटी जोधपुर के शोधकर्ताओं ने कृषि अवशेष और प्लास्टिक कचरे को संयोजित कर एक ऐसा मिश्रण तैयार किया है, जो उच्च तापमान पर भी स्थिर रहता है और निर्माण कार्यों में लंबे समय तक टिकता है। इस तकनीक का पेटेंट भी प्राप्त हो चुका है, जिससे इसे बड़े पैमाने पर उद्योग में अपनाने की संभावना बढ़ गई है।
यह नवाचार न केवल प्रदूषण नियंत्रण में मददगार है, बल्कि ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्रों में सस्ता और टिकाऊ आवास उपलब्ध कराने में योगदान देगा। खासतौर पर विकसित हो रहे क्षेत्रों में जहाँ तेजी से आबादी बढ़ रही है, वहां इन बायो-ब्रिक्स का उपयोग आने वाले समय में सामान्य हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की प्रौद्योगिकी से पारिस्थितिकी तंत्र पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और साथ ही रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे, क्योंकि कृषि कचरे के संग्रहण व निर्माण कार्य में स्थानीय लोगों की भागीदारी संभव होगी।
आईआईटी जोधपुर की टीम ने बताया कि अगले कुछ महीनों में इन बायो-ब्रिक्स का व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने की योजना है, जिससे यह तकनीक देश के बड़े हिस्से में पहुंच सके। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण होगा बल्कि निर्माण लागत में भी एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा।
सरकार और विभिन्न संगठनों द्वारा इस पहल को समर्थन मिलने से उम्मीद जताई जा रही है कि भारत में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में यह एक उल्लेखनीय कदम साबित होगा।



