चित्तौड़: दशहरे पर नहीं, एकादशी को जलता है रावण, मरमी माता शक्तिपीठ की अनोखी कहानी

राशमी तहसील, चित्तौड़गढ़, राजस्थान – जिले की राशमी तहसील में स्थित प्रसिद्ध मरमी माता शक्तिपीठ आज लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यह स्थान पहले एक छोटे से चबूतरे के रूप में जाना जाता था, लेकिन अब यह भव्य मंदिर और विशाल मेले के लिए विख्यात है, जो यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाता है।
मरमी माता शक्तिपीठ की स्थापना को लेकर स्थानीय लोगों में एक खास विश्वास प्रचलित है। कहा जाता है कि करीब 60 वर्ष पूर्व एक भक्त को दैवीय स्वप्न में मरमी माता ने दर्शन दिए थे, जिसके बाद यहां एक छोटा मंदिर बनवाया गया और पूजा-अर्चना शुरू हुई। धीरे-धीरे श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई और मंदिर का विस्तार हुआ। आज यह शक्तिपीठ क्षेत्रीय धार्मिक पर्यटन का एक मुख्य केंद्र है।
इस शक्तिपीठ का खास आकर्षण यहाँ का वार्षिक मेला है, जिसे मरमी माता मेला कहा जाता है। यह मेला पूरे राजस्थान में अपनी विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है। दीपावली के बाद आने वाले दिन में ग्रामीण और शहरों से हजारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं, लेकिन इस मेला की एक विशेष बात यह है कि रावण दहन दशहरे के बजाय एकादशी को आयोजित किया जाता है।
स्थानीय परंपरा के अनुसार, दशहरे के दिन अधिकांश किसान अपने खेतों में व्यस्त रहते हैं और मेले मेंAttendance कम होती है। इसलिए मेला आयोजकों ने दशहरे के बजाय एकादशी को रावण दहन और मेले का आयोजन शुरू किया। यह परंपरा आज भी बनी हुई है और एकादशी के दिन यहाँ रावण दहन के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं।
मेले के दौरान श्रद्धालु मरमी माता के दर्शन के लिए मंदिर में जुटते हैं, जहां धार्मिक आयोजन, पूजा, भजन और कीर्तन होते हैं। साथ ही मेले में विभिन्न प्रकार के लोक नाट्य, हस्तशिल्प, वाद्य यंत्रों की बिक्री और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी होती हैं, जो स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखती हैं।
मरमी माता शक्तिपीठ के पुजारी श्री लाल चन्द्र शर्मा का कहना है कि यह मेला ना केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम भी बन चुका है। उन्होंने बताया कि हर वर्ष प्रशासन और स्थानीय लोगों की सहयोग से मेले का सफल आयोजन सुनिश्चित किया जाता है, जिससे क्षेत्र की आर्थिक विकास में भी मदद मिलती है।
मरमी माता शक्तिपीठ और उसके मेले की यह अनोखी परंपरा चित्तौड़गढ़ के धार्मिक नक्शे पर खास पहचान रखती है। जहाँ एक ओर यहां की आस्था और श्रद्धा दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण जीवन की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय विश्वासों की झलक भी देखने को मिलती है।
संक्षेप में, मरमी माता शक्तिपीठ का यह मेला न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक व आर्थिक दृष्टि से भी इस क्षेत्र के लिए एक अमूल्य संसाधन बन चुका है। रावण दहन की इस विविधता ने इसे अन्य धार्मिक आयोजनों से अलग और विशेष बना दिया है, जो प्रदेश के तीर्थाटन स्थलों में उत्सुक श्रद्धालुओं के लिए एक अनूठा अनुभव प्रस्तुत करता है।




