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राजस्थान: 5 बेटों ने झगड़ा कर घर पर किया कब्जा, रुला देगी बेबस पिता की यह कहानी

कुचामनसिटी, राजस्थान – कुचामनसिटी शहर के नली के बालाजी की संकरी गलियों में इन दिनों एक बूढ़ी जिंदगी की टूटी उम्मीदें धड़क रही हैं। यह दर्द है 70 वर्षीय पिता छीतरमल कुमावत का, जिसने अपनी पूरी उम्र बेटों का भविष्य संवारने में लगाया, लेकिन बुढ़ापे में उन्हीं बेटों ने पिता का आश्रय छीन लिया।

छीतरमल कुमावत, जो जीवन भर मेहनत मजदूरी और छोटी-छोटी खेती से अपने परिवार की परवरिश करते आए, आज मानसिक और शारीरिक दोनों रूप से असहाय हैं। उनकी कहानी न केवल एक विकट पारिवारिक विवाद की है, बल्कि समाज में बुजुर्गों के प्रति बढ़ती उपेक्षा को भी उजागर करती है।

स्थानीय निवासी बताते हैं कि छीतरमल के पांच बेटे हैं, जिनके बीच लंबे समय से संपत्ति और घर को लेकर मनमुटाव चला आ रहा है। हाल ही में संपत्ति के बंटवारे को लेकर हुए विवाद ने इतना बिगाड़ा कि बेटों ने आपस में लड़ाई झगड़ा कर लिया और अपने पिता को ही घर से बेघर कर दिया। अब 70 वर्षीय वृद्ध, जो बीमार भी हैं, बाजार में आवारा घूमते पाए जाते हैं।

कुचामनसिटी के सामाजिक कार्यकर्ता राम सिंह ने कहा, “यह मामला बुजुर्गों के अधिकारों और सामाजिक जिम्मेदारी की बड़ी चुनौती है। छीतरमल जैसे बुजुर्गों के साथ जो व्यवहार हो रहा है, वह मानवता के खिलाफ है।” उन्होंने प्रशासन से भी इस मामले में जल्द से जल्द हस्तक्षेप करने की मांग की है।

छीतरमल ने बताया, “मैंने अपने बेटों के लिए सब कुछ किया, पर आज जब मुझे मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है, वे मुझे नजरअंदाज कर रहे हैं।” उनकी आंखों में गम और निराशा साफ झलक रही है।

स्थानीय पुलिस ने इस मामले को संज्ञान में लेकर जांच शुरू की है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि वे पारिवारिक विवाद के समाधान के लिए प्रयासरत हैं और संभावित तौर पर पुनर्वास की व्यवस्था भी करेंगे।

यह कहानी सिर्फ एक परिवार की दुखद दास्तान नहीं, बल्कि पूरे समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि वृद्धजनों का सम्मान और सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। सरकार और सामाजिक संस्थाओं को भी ऐसे केसों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है ताकि बुजुर्गों के प्रति जिम्मेदारी का माहौल बन सके।

छीतरमल कुमावत के जीवन की यह कथा हमें एक सशक्त संदेश देती है कि परिवार की दुश्मनी इंसानियत के रिश्तों को कैसे तोड़ सकती है। उम्मीद है कि इस कहानी से समाज के सभी वर्ग संवेदनशील होकर यदि चाहें तो बुजुर्गों की ये टूटती उम्मीदें फिर से संजीवित की जा सकती हैं।

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