श्री गंगानगर

खास बच्चों की नज़दीक से समझी जाने वाली अनसुनी दास्तां

श्रीगंगानगर, राजस्थान।

विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर हर साल ऑटिज्म के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने की कोशिश की जाती है, लेकिन श्रीगंगानगर जिले के असली हालात इससे कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक हैं। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जिले में केवल 23 बच्चे ऑटिज्म से ग्रसित हैं, जबकि निजी स्कूलों की रिपोर्ट में यह संख्या 100 से अधिक बताई जा रही है। यह अंतर वास्तविक स्थिति की पूरी तस्वीर दिखाने में असमर्थ है और यह दर्शाता है कि ऑटिज्म की पहचान और इलाज की प्रक्रिया अभी बहुत पीछे है।

शहर की 6 वर्षीय एक बच्ची की मां ने बताया कि तीन साल तक उन्हें पता नहीं था कि उनकी बच्ची को ऑटिज्म है। वे समझती थीं कि उनकी बेटी सामान्य से कुछ धीमी बोलती है, परंतु जब स्कूल में सामाजिक और व्यवहार संबंधी समस्याएं सामने आईं, तब जाकर डॉक्टर से जांच करवाई गई। मां ने कहा, “अब हमारी बेटी स्पीच और ऑक्यूपेशनल थैरेपी ले रही है और सुधार भी दिख रहा है, लेकिन इलाज का खर्च परिवार के लिए बहुत मुश्किल भरा है।”

इसी तरह, वार्ड-13 निवासी राजेश के 5 वर्षीय बेटे को तीन वर्ष की उम्र में ऑटिज्म पाए जाने के बाद, परिवार ने पूरी तरह से इस स्थिति को समझना शुरू किया। राजेश ने बताया कि आसपास के लोग अक्सर बच्चे के व्यवहार को शरारत समझ कर गलतफहमी फैलाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऑटिज्म एक मानसिक विकास संबंधी स्थिति है, बीमारी नहीं।

मेडिकल विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटिज्म के बारे में समय रहते जागरूकता बढ़ाना और उचित पहचान कराना बेहद जरूरी है ताकि उपचार और सामाजिक समावेशन शुरू हो सके। इसके लिए सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर अनेक प्रयास हो रहे हैं, परंतु अभी भी जागरूकता की कमी और सामाजिक पूर्वाग्रह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

शिक्षा विभाग भी निजी और सरकारी स्कूलों में ऑटिज्म से ग्रसित बच्चों की सही पहचान और सहायक कार्यक्रमों को लागू करने की दिशा में काम कर रहा है। इसमें शिक्षक प्रशिक्षण, अभिभावक भोजन और मानसिक स्वास्थ्य पर सेमिनार शामिल हैं।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि परिवार और स्कूल मिलकर बच्चों की सहायता करें, ताकि वे बेहतर विकास कर सकें और समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें। साथ ही सरकारी पोर्टल पर ऑटिज्म संबंधित सुविधाओं की जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है।

यह स्पष्ट है कि ऑटिज्म से जुड़े बच्चों और उनके परिवारों की समस्या केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि सामाजिक समझ और आर्थिक सहायता की भी है। ऐसे बच्चों के लिए समाज का समावेशन और सहयोग ही सबसे बड़ा उपचार होगा।

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